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आर्मी एरिया में कैसे पहुंचा जाए.


भाग : 6

जिन जगहों पे अब मैं रातभर के लिए या कुछके घंटे के लिए भी रुक रहा था, वे सभी ही खूबसूरत थी। ऐसे में वहाँ ठहर जाने या कुछेक घंटे और अधिक रुकने का मन होना स्वाभाविक ही था। परंतु इससे ज्यादा मेरा मन लगातार चलते रहने में रम रहा था। सबसे ज्यादा मजा बस में आता जब बस पहाड़ों से होकर गुजरती। लगातार सफर में होने के बावजूद भी मुझे बस में नींद नहीं आती और मैं आश्चर्य भरी आँखों से खिड़की के बाहर झाँकता रहता। एकसाथ सबकुछ आश्चर्य से भरा था, पहाड़ की ऊंची-ऊंची चोटी, नीचे खाई और कहीं बीच से गुजरती बस। मैं सोचता आदमी ने पहाड़ को काटा कैसे होगा, और ये सड़कें कैसी बनी होगी। ड्राइवर की कॉन्फिडेंस पर आश्चर्य होता, वह इतनी तेजी में खाई के बगल से बस निकाल लेता कि मैं डर सा जाता।
रिकोंगपिओ से आगे रास्ता चुनने के लिए एक बार फिर मैं बस स्टॉप पर बैठा सोच रहा था कि आगे किधर निकला जाए। मैं सांगला जा सकता हूँ, यह भी एक टूरिस्ट स्पॉट है, मैं शिमला की ओर बढ़ सकता हूँ, फिर शिमला भी टूरिस्ट स्पॉट है और वहां भी भीड़ होगी ही। मैं टूरिस्ट स्पॉट पर जाना नहीं चाहता, एक तो ऐसी जगहें बहुत महंगी होती है, दूसरी यह क्राउड मुझे सही नहीं लगती। शोर-शराबा। लगता सारा शहर पहाड़ों में मार्केटिंग के लिए व चिप्स खाकर पैकेट इधर उधर फेकने के लिए आ धमका है।

Photo : #ACP

एकबार फिर मैं काउंटर पर गया और बोला "मुझे सबसे लंबी रूट की, किसी गाड़ी की टिकट दे दीजिए....शिमला का नहीं!"
"किधर जाना है?" काउंटर से उसने पूछा
"स्पीति!" मैंने कहा।
"स्पीति के लिए अभी कोई बस नहीं है!"
"ठीक है, जहाँ के लिए भी है। वहाँ का दे दीजिए।" मैंने उतनी ही आस्वस्ति में कहा।
"सिद्धों की एक बस है, अभी थोड़ी देर में।"
"अच्छा है फिर, आप सिद्धों का दे दीजिए।" मेरा इतना कहते ही उसने मेरी ओर अजीब नजरों से देखा। मैं समझ गया, मुझे थोड़ा धैर्य रखना चाहिए।
वह आगे बोला "मैं नोवा का दे देता हूँ। सिद्धों में तुम रह नहीं सकते। वह पूरा आर्मी एरिया है। और नोवा अच्छी जगह है, वहाँ बहुत से लोग घूमने भी आते है। एक लेक भी है।" उसने मुझे गाइड करने की कोशिश की। मैंने उसकी बातों को सुना और वहीं खड़ा रहकर सोचता रहा कि क्या करूँ। चूंकि मेरे पीछे भीड़ थी ही नहीं इसलिए मेरे पास मौका था ज्यादा से ज्यादा उससे जान लेने का।
मैं सोच रहा था, नोवा अगेन एक टूरिस्ट स्पॉट है। और तभी क्या न सुझा कि मैंने उनसे पूछा "सिद्धों और नोवा के बीच में कोई गाँव है क्या?"
टिकट वाले भईया ने थोड़ा अजीब नजर से मेरी ओर देखा और उसने मशीन में कुछ टिपा। अगले ही पल मेरी हाथों में उसने एक टिकट पकड़ा दिए। मैंने पढ़ा, लिखा था "चांगो।"
बस अगले आधे घंटे में थी। मैं बस में आ गया। देखा, एक वृध्द मेरी सीट पर बैठे हुए है। सीट सबसे आगे थी, इसलिए मेरा मोह और बढ़ गया वहां बैठने को। मन मारकर मैं उनसे कुछ कहे बिना कहीं और बैठ गया। अब मेरे दिमाग मे दो बातें चल रही थी, एक तो सिद्धों, आर्मी एरिया में कैसे पहुंचा जाए और दूसरी चांगो कैसी जगह होगी?


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