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Showing posts with the label मोना_लिसा के लिए

【 मैं तुम्हारा हिस्सा हूँ 】

कहां-कहां से मिटाओगी मुझे अपने फेसबुक के वॉल से हटा दोगी डायरी के पन्नों से उन एक एक शब्द को काट कर दूर फेक दोगी जो तुमने मेरे बारे में लिखा है, अपनी उन सारी फोटोज को भी जला डालोगी जिसे मैंने क्लिक किया है? पर उन स्पर्शों का क्या जो आज भी तुम्हारी जिस्म पर मेरी एहसास बनकर रेंगती होगी। Photo - #ACP क्या तुम उन तमाम रातों को भी मिटा पाओगी, जो तुमने मेरी आँखों में जागकर बिताए है? मुमकिन होगा तुम्हारे लिए, उन शब्दों को फिर से   अपने किसी नए प्रेमी के लिए गढ़ना जिसे तुम मेरे लिए कभी गढ़ा करती थी? और आज भी   तुम आईने के सामने खड़ी होकर जब माथे के उस छोटे से गड्ढे के बीच बिंदी टिकाती होगी तब भी क्या, इस एहसास को भुला पाती होगी कि, मैं ठीक तुम्हारे पीछे खड़ा हो तुम्हें निहार रहा हूँ? और क्या अब भी तुम चाँद को, वैसे ही देखती रहती हो घण्टो? याद है तुम्हें जब यूँ ही चाँद को रात भर देखती हुई तुम कहती थी मुझसे   "मैं रात भर तुम्हें देखती रही" क्या तुमने उन रातों को भी भुला दिया है? मुमकिन है, तुम्हारे लिए आसान रहा हो   यादों को भुला पाना, या आज भी...
बनना तो चाहता था मैं तुम्हारी ठोडी का तिल। पर बन बैठा मैं तुम्हारा प्रेमी। अलग तो होना ही था। # ACP

खामोश आहट

न दिन होता है अब और न ही रात होती है बस ख्यालों में उनसे मुलाकात होती है। मन के दरवाजे पे बैठा दरबान बार-बार किसी के आहट का संकेत देता है देखती है नजरे उधर पर उनके अनुपस्थिति भर से नजरें खामोश होती है। दूसरे कमरे में बैठा मेरा छोटा भाई, थोड़ी-थोड़ी देर पे किसी सुडोको को सुलझा लेने पर खुशी से ऐसे उछल पड़ता है जैसे कभी उनके आहट पर मैं उछल जाया करता था। कौन जाकर उनसे कहे भला कि विरह का आलम जिस्म के जर्रे-जर्रे को ऐसे तोड़ रहा है कि मिलने की इबादत में ही यह जिंदगी तमाम होती है।

प्रीतिकर

साथ बिते वक्त की तुलना में हमारे बिछोह का वक्त ज्यादा है हमारे हिस्से, इसलिए एक वक्त में मिलने से बिछुड़ने तक बिता वक्त एक स्थिर घटना है हमारे लिए, जिसमें समय से ज्यादा हम खुद घटते है। यूँ फिर मिलन के बाद की जुदाई में स्थिरता आ जाती है हमारे बीच, अगली मिलन तक के लिए। जब यादें हमारे अंदर घटती रहती है हमारा चित्त, एक-दूसरे से बहुत दूर होते हुए भी यादों में करीब होता है। इतना करीब कि, इन नजदीकियों में मिलन के बाद कि जुदाई ही, शाश्वत लगती है बाकी सभी सन्नाटे ही लगते है।।

रेखाचित्र

बहुत ही कम दिनों तक साथ रही वह साथ के दिनों में जब भी वह मिलती घंटो कभी बातचीत में तो कभी खामोशी में कट जाती अक्सरहाँ मिलकर पता नहीं कौन सी आकृति कलम से वह मेरे शरीर के अलग-अलग ...

प्रेम

चाँद अब भी कितना दूर दिखता है मुझे जबकि अभी अभी वह मेरे पास से उठकर गया है जब दूर होता है वह आसपास एक धूंधली छाया होती है उसके और जब पास होता है तब चाँदनी की रात हो जैसे बहुत बार उसके दूर चले जाने के बाद मैं सोचता हूँ आखिर रोक क्यों नहीं लिया मैंने उसे पर रोक लेना भी क्या सही होता? चले जाने पर जो उसकी खुशी है और फिर वापस आने का जो उसका उत्साह है उसी में तो हमारे प्रेम का प्रवाह है और प्रवाह को रोक लेना क्या नदी को नाला बनाना न हुआ! तो बहुत बार सोचने,मन होने के बावजूद मैं उसे नहीं रोकता मैं हर बार की जुदाई सहते हुए उसके आने के उमंग को जीना चाहता हूं मैं उस लम्हा को जीना चाहता हूँ जो उसके आने की खबर से मेरे अंदर कौंधती है मैं उसकी चेहरे के उस उत्साह को जीना चाहता हूं जो उत्साह वह हमारे रिश्ते में महसूस करती है हमारी व्यक्तिगत स्वतंत्रता ही हमारे रिश्ते की खूबसूरती है इसलिए मैं उसे कभी नहीं रोकना चाहता यूँ ही उसके जाने के बाद की विरह को महसूस कर उसके आने के उत्साह को जीना चाहता हूँ।

तुम नहीं समझोगी

जब हर बार थक जाता है जिस्म नींद की आगोश में जब ऊब सा जाता है बदन सोये-सोये यूँ ही खोए से तब कुछ देर के लिए ही सही यह दूरी मिलों लंबी जान पड़ती है लगता है एक-एक पल एक अरसा सा है जिसमें मैं निरंतर जलता जा रहा हूँ।। नींद की यह अपनी खूबी है कि वहाँ कोई सीमा नहीं ना ही कोई बंधन है।। तुमने आज संदेशा भिजवाया है कि तुम शनिचर की संध्या पे मिलोगी पर मैं तुम्हें कैसे बताऊँ कि आज तो मंगलवार ही है।। क्या तुम कभी मंगलवार से शनिचर के बीच की दूरी को समझ पाओगी तुम गणित लगा पाओगी कि इन दिनों में कितने घंटे होते है और उन घंटो में कितनी मिनटे होती है और क्या ये भी महसूस कर पाओगी कि उन प्रत्येक मिनट के हर एक सेकंडों में मैं कैसे जलता हूँ? और क्या तुम मेरे शरीर के उस ताप को सहन कर पाओगी? जब तुम आओगी तब यह ताप मिश्रित सुख की ठंडक में बदल चुका होगा जिसकी छाव में बैठकर हम घंटों बातें करेंगे मैं भूल जाऊंगा कि तुम्हारे विरह में मैं कैसे जल रहा था मैं यह भी भूल जाऊंगा कि अब से कुछ ही देर बाद तुम चली जाओगी और फिर से वही आग मुझे झुलसायेगी ...

कभी तो तुम भी कुछ बोलोगी !

अक्सर मैं तुमसे कुछ सुनने के लिए बहुत ज्यादा बोल जाता हूँ मैं बोलता जाता हूँ कि, तुम भी बोलोगी और तुम सुनती जाती हो सिवाय अच्छा है, बढ़िया है कहने के। अक्सरहां जब भी मैंने तुम्हें मैसेज किया है यही उम्मीद किया है कि आज मैं जी भर के तुम्हें सुनूँगा पर उम्मीदों का स्तर भी तो हम तक ही सीमित होता है इसलिए कभी तुम मेरी इस उम्मीद को पूरी नहीं कर पाई फिर भी मैं आज भी आशांवित हूँ किसी दिन तुम जी भर कर बोलोगी और मैं तुम्हारा श्रोता होऊँगा सिवाय यह कहने के कि अच्छा है बढ़िया है।। कोई किसी को क्यों सुनना चाहता है मेरे लिए यह प्रश्न अब महत्वपूर्ण नहीं रह गया है बल्कि इसके कि कोई किसी के सामने खुलता क्यों नहीं वह अपने सुख-दुख क्यों नहीं बाँटना चाहता निश्चित ही मैं तुम्हारा कल का बना दोस्त नहीं हूँ और न ही वर्षों से तुम्हें जानने वाला कोई शख्स पर मैं तुम्हारा प्रेमी हूँ जो तुम्हारे बारे में ही जानना चाहता है उसके लिए देश दुनिया अब उतना ही पराया है जितना कि किसी विरही के लिए दूर का कोई गाँव और सबकुछ मैं तुम्हीं से जान लेना चाहता ...

बाली

किसी जन्म में मैं तुम्हारी कानों की बाली रहा होऊँगा फिर कभी कुछ यूं हुआ होगा कि तुम्हारी जुल्फ़े बाली में फस गई होगी और फिर तुम जुल्फों को छुड़ाने के लिए जितना खीचती हो मैं उतना ही दूखता हूँ।।

'धत्त!, उसे बंडी नहीं,कोटि बोलते है'

'अच्छा सुनो न' 'हां जी, कहिये न' 'वो जो तुमने आज पहना था न, उसमें तुम काफी खूबसूरत लग रही थी' 'अच्छा, क्या पहनी थी?' 'वही,जो सलवार के ऊपर पहनी थी न!' 'अरे क्या?' 'बंडी' 'बंडी?' 'हाँ' 'धत्त!, उसे बंडी नहीं,कोटि बोलते है'

'ऐ मोना! कुछ बोलो न!'

और उस दिन फिर से मिलने को आतुर प्रेमी ने अपनी प्रेमिका को कॉल किया "मोना,आज आओगी न मिलने" और उधर से प्रेमिका ने वही कहा जो वह दो दिन से कहती आ रही थी "आज भी न मिल पाऊँगी, घर पर बहुत काम है" "अच्छा!" प्रेमी ने बुझे मन से कहा।उसे आगे कुछ सूझ नहीं रहा था कि क्या बोले।पर वह बोलना चाहता था,सुनना भी चाहता था क्योंकि वह जानता था एक बार कॉल कट जाने के बाद वही विरह की अग्नि। कुछ देर तक तो दोनों एकदूसरे की खामोशी ही सुनते रहे।फिर प्रेमिका ही बोली "दो दिन पहले ही तो मिली थी,फिर काम खत्म होते ही आऊंगी न!" "दो दिन पहले! पता है,मोना।दो दिन में कितने पहर होते है।और उन पहरों में कितनी लम्हा होती है...."। प्रेमिका कुछ न बोली।उसने केवल अपने बेचैन प्रेमी की धड़कने सुनी। "....और मोना! अगर उन एक-एक लम्हों में हज़ार-हज़ार बार भी मेरी धड़कने धड़कती है तो तुम अंदाजा लगा पाओगी कि कितना बेचैन होता हूँ मैं तुम्हारे बगैर" प्रेमिका ने इस बार भी कुछ नहीं कहा। 'ऐ मोना! कुछ बोलो न!' "क्या बोलूं?" "कुछ भी,जो भी ...

मोना_लिसा

मैं किसी दिन यूं ही तुम्हारी धड़कने बन जाना चाहता हूं और चाहता हूँ तुम्हारी सीने में धड़कता रहूँ तुम जितनी भी सांसे लो ऑक्सीजन के हर उस कतरा में मैं बस जाऊ मैं चाहता हूँ कि वह दृश्य बन जाऊं जिसे देखना तुम्हें सबसे ज्यादा पसंद हो मैं हर एक उस गीत का बोल बन जाना चाहता हूं जो तुम गुनगुनाती हो। मैं ठीक वैसा ही बन जाना चाहता हूं जैसा कि कोई ख़्वाब बसता है तुम्हारी सपनों में और फिर,एकदिन मैं वह हकीकत बन जाना चाहता हूं जो तुम्हारी जिंदगी का एक अभिन्न हिस्सा हो।। ©ACP