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Showing posts with the label अवलोकन

तुम्हें नंगा नाच नचाया जाएगा, तुम भागना चाहोगे पर भाग नहीं पाओगे.

तुम सारे दीवालों को पोत दो, इन तीन रंगों से सड़के, आसमान और यहाँ तक की हवा को भी रंग दो इन तीन रंगों से। शहर, गांव और नगर के हरेक नुक्कड़ तक का नाम बदल दो और रख दो वह नाम जो तुम्हारे हिसाब से देशप्रेम का प्रतीक हो। हरेक का नाम भी बदल दो नदी, नक्स, पेड़ जंगल सब का नाम बदल दो और बना दो एक कानून की हरेक जन्मने वाले का नाम भी देशप्रेम रख दिया जाए। Photo #ACP उसे कपड़े देशप्रेम की पहनाया जाए उसे कहानी देशप्रेम की सुनाई जाए और स्कूल में भी उसे केवल देशप्रेम की ही शिक्षा दी जाए। तुम यह भी कानून बना दो कि लोग केवल देशप्रेम की ही बातें करें देशप्रेम की रचना करें देशप्रेम की गीत गाए देशप्रेम की सिनेमा बनाए और देशप्रेम की बात चले तो सम्मान पूर्वक, वह खड़ा हो जाए। और जो भी ऐसा न करें उसे सरे राह सूली पे चढ़ा दो एक भीड़ को तैयार कर दो जो सारे आम तुम्हारी इस सड़ी हुई मानसिकता को ढ़ो सके, उसे सह दे सके। बीते हज़ारो सालों में ऐसा नहीं हुआ, फिर भी देश चलता रहा देशप्रेम की भावना बरकरार रही, पर तुम कुछ उच्चक्के ऐसे थे, जिसने इस भावना को महसूस ही नहीं किया जिसे समझ...

पागल खुद की भी कहां सुनता है!

Photo #ACP गली के नुक्कड़ का दुकानदार रोज सुबह-सुबह दुकान खोलकर बैठ जाता है देर रात गए तक वह वहीं बैठा होता है गली के एक छोड़ से मुख्य सड़क तक ले जाने वाला ऑटो ड्राइवर भी सुबह से शाम तक ऑटो चलाता रहता है और ऑटो में एकजैसे गाना ही बजाता है। और वो सब्जी वाला सुबह और शाम दोनों ही वक्त एक ही जगह अपनी दुकान लगाता है। रोज ऑफिस मैं एक ही रास्ते से जाता हूँ और लगभग तय समय तक घर वापस आ जाता हूँ फिर कभी कभी मेरा मन होता है कि, मैं घर से निकलूं और मेट्रो स्टेशन पर जमकर डांस करूँ और सब उदास चेहरे जैसे अचानक से खिलखिला उठे अपना बैग, टाई और जूता सब फेक दूँ या अचानक से मेट्रो में चिल्लाने लगूं और मेट्रो की वो लाल बटन झट से दबा दूँ कि सब ऑफिस जा ही न पाए और वहीं खड़े होकर एकदूसरे से पूरे दिन बात करते रहे। ऑफिस से लौटते वक्त शाम को जैसे मन होता है कि जूता वहीं सड़क पर खोलकर दूर तक पैदल चलता जाऊं और किसी अजनबी वन वे रास्ते पर निकल जाऊं जो इस शहर से दूर ले जाती हो सुबह रोज मैं ट्रैफिक में फंसता हूँ और सोचता हूँ कि अगली सुबह घर से जल्...

माँ।

【माँ घर के अंदर ही रहती है बाहर, सिर्फ माँ की यादें होती है।】 कितनी-कितनी बार मैंने कहा है माँ से बाहर चलने को, पर हर बार माँ टाल दिया करती कहती, "कितना काम पड़ा है।" हमेशा माँ ऐसा ही कहती थी मैं जिद्द करता फिर भी, वह यही कहती। माँ घर के अंदर ही रहती बाहर, सिर्फ माँ की यादें होती है। दिनभर से लेकर देर रात तक माँ घर भर में ही इधर से उधर भागती रहती और अगले दिन तड़के सुबह ही जग कर घर बुहारने लग जाती। घर के छोटे से बड़े बुहारने से लेकर पुताई तक का काम मां ही करती थी कौन से खेत में क्या बुआई करनी है और कटाई के वक्त तक मे भी सबपर माँ ही ध्यान देती। पर कभी भी उन्होंने चारदीवारों से बाहर कदम नहीं रखा। माँ ने अपनी दुनिया चारदीवारी में ही बसा लिया था उन्हें देख लगता था, मेरी बाहर की दुनिया भी कितनी छोटी है पर उन दीवारों के बीच रहते हुए ही माँ ने मुझे बाहर के तौर तरीके सिखाए चारदीवारों से ऊपर की आसमां में उड़ने का हौसला दिया और ढ़ेर सारे सपने दिए। जिनपर सवार हो मैं बहुत दूर निकल आया इतनी दूर क...

【समुद्र इतना अशांत क्यों होता है?】

बहुत बार समुद्र के  अलग-अलग किनारों पे  मैं बैठा हूँ, और हरेक दफ़े समुद्र मुझे उतना ही अशांत और उतावला दिखा है, जैसे अपनी प्रकृति के अनुकूल  अपनी धारा में किसी को आने नहीं देना चाह रहा हो। मैं देखता जाता हूँ किसी नाविक को, और उसके नाव को जो निरन्तर संघर्ष करता हुआ  समुद्र की बाहों में समा जाना चाहता है, बहुत दूर, जहां तक मेरी नजरें देख सकती है वहाँ एक चट्टान है, बड़ी और काली चट्टान, उतावला समुद्र ये भी नहीं समझता  और वह उससे लगातार टकराता हुआ चट्टानों को भी अपनी सिमा से खदेड़ देना चाहता है। बहुत बार जब भी मैं बैठा हूँ समुद्र किनारे, यही सोचता हूँ कि समुद्र इतना अशांत क्यों हैं जबकि हर कोई तो  समुद्र किनारे  आकर शांति पाना चाहता है। #ACP

सोया हुआ आदमी

जब सोया हुआ आदमी नींद की आगोश से जगा दिया जाता है तो भी क्या वह सपनो से बाहर आ पाता है सोने से पहले और सोने के बाद कि दुनिया में सपनों का एक संसार बसता है क्या आदमी कभी उससे मुक्त हो पायेगा या तमाम उम्र उन सपनों की लकीरें उसका पीछा करती रहेगी आदमी आधा जिंदगी जाग कर और आधा जिंदगी सोकर बिता देता है पर क्या उन जागे हुए जिंदगी में भी वह जगा होता है? या जागते हुए भी वह अपने देखे सपनों की ही दुनिया मे होता है उसका देखा सपना ही उसका संसार है बाकि जो वो देख रहा है वह तो किसी और की ख्वाबों का बासिन्दा है।

घर

घर केवल इसलिए तो नहीं होता कि लौटकर शाम को आया जा सके कई दफ़े मैं सुबह निकल कर घर से बहुत दूर चला जाता हूँ इतना दूर कि लौटने की इक्छा ही नहीं होती पर देर सबेर घर अपने पास बुला ही लेती है घर एक जरूरत है बहुत सारी संभाली हुई जरूरत के पास लौट आने की जरूरत।। #ACP

जब कुछ नहीं दिखता

                   जब कुछ नहीं दिखता वह हाथ देता हूँ पर कोई गाड़ी नहीं रोकता देर रात हो गयी है न ! इसलिए आदमी का आदमी से भय बढ़ गया है सड़के सुनसान है एकाध गाड़ी तेज़ी से गुज़र जाती है और एकाध टेडी-मेढ़ी भी रात में किसी को किसी का परवाह नहीं होता और रात बनती भी तो ऐसे ही है बहुत देर बाद एक बस उसके सामने आकर रुकी है ड्राइवर ने शायद उसे देख लिया हो रात में भी कुछ लोग दूसरों को देख लेते है वह कहाँ जा रहा है इससे कोई फर्क नहीं पड़ता बस जहाँ भी उसे पहुँचा देगी उससे आगे की वह सोचेगा पर रात में सोचने भर से भी कुछ नहीं होता तब हमारी सोच पे भी रात का साया होता है इसलिए ही शायद रात ज्यादा भयानक होती है रात ऐसी ही हुआ करती है यह अपने होने के क्रम में और भयानक होती जाती है कुछ देर के बाद ड्राइवर बस को किसी किनारे लगा देगा और उससे कहेगा कि तू अब चला जा या ऐसा भी हो सकता है कि ड्राइवर ज्यादा दयालु हो   और वह सोचे कि यह रात में कहां जायेगा ? क्योंकि रा...

तन्हाई

                                                        तन्हाई                                                  ****** बहुत से लोगों को मैं जानता हूँ और उनमें बहुत से लोग मुझे भी जानते है फिर भी मैं   कभी कभी अकेला बच जाया करता हूँ मेरे पास कोई नही होता और कुछ लोग पास होकर भी दूर ही होते है मैं ऐसे बहुत से लोगों को जानता हूँ जिनसे मैं चैट कर सकता हूँ फेसबुक पे मेरे छह सौ दोस्त है फिर भी कभी कभी मैं तन्हा बच जाया करता हूँ मैं चैट को ऑन कर देता हूँ और घण्टो उनमें झांकता रहता हूँ मैं तय नहीं कर पाता कि   मैं किसको मैसेज करूँ और उधर से भी किसी का मैसेज नही आता मेरे कांटेक्ट लिस्ट में भी बहुत से नंबर सेव है मैं उन गलियों में भी घूम आता हूँ और   अंत मे उकता कर मोब...

न ! बिल्कूल नहीं.

तुम कहते हो ! सहसा था यह न ! बिल्कूल नहीं यह तो धीमी लौ पर उबलता अदृश्य पानी था जिसे कभी न कभी तो बाहर आना ही था और तुम ! तुम कहते हो सहसा था,यह  न ! बिल्कूल नहीं क्या कभी सहसा उबले पानी में इतनी गर्मी देखी है तूने ! मैंने तो नहीं जा पूछ उस भुक्तभोगी से और भुक्तभोगी तो तुम भी दिखाते हो अब तरस तो तुम पे भी आता है जो खुद के अंदर जन्मे धीमे लौ को भी न महसूस कर सका और हाथ जला आया सहसा थोड़े ही था यह और तुम कहते हो सहसा था यह अरे अपने अंदर की गर्मी तो जानवर भी पहचान लेते हैं और और तुम हाथ जलाकर कहते हो सहसा था यह न बिल्कूल नहीं !!

कमबख्त रास्ते का अजनबी.

पचास_ _साठ_ _ और फिर। मद्धम शाम की सुनसान सड़कों पर उसकी गाड़ी सत्तर किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से भाग रही थीं और उसकी आँखें लगातार तेजी से किड़े-मकोड़े की टक्कर झेलती हुई आगे देखने की कोशिश में थी।                           दूसरी ओर,किनारे को पार करता हुआ मेढ़क सड़क के लगभग बीचोबीच पहुंचा ही था कि उसकी नज़र मेढ़क पर जा टिकी।उसे लगा कि वह बगल से निकाल लेगा और तभी मेढ़क गाड़ी के चक्के के ठीक सामने आ गया। गाड़ी और मेढ़क के बीच फासला लगभग साढ़े पाँच फुट की।और गाड़ी तेजी से आगे बढ़ती हुई।फासला घटता हुआ और कमबख्त मेढ़क बीच सड़क पर स्थिर बैठा। और फिर वह सिधा मोटर साइकिल के अगले ब्रेक को लेता हुआ पिछले ब्रेक पर खड़ा हो गया। ...........................मोटर साइकिल की लाईट अब भी जल रही थीं।मोटर साइकिल में फसे पैर को निकालते हुए व माथे की चोट को मलते हुए,मोटर साइकिल की हल्की रोशनी में उसने देखा कि मेढ़क अब भी वहीं बैठा हुआ उसकी ही ओर देख रहा है।

अंतरमन

प्रकृति की  रचनाओं   में  अनेक  अदभूत   रचनाएँ   हैं।यूँ   तो  प्रकृति की प्रत्येक रचना  अचंभित   करती   हैं;प्रकृति  की  इन्हीं   अचंभित   करने   वाली  अनेक  रचनाओं   में  से एक  अदभूत  अनुपम कृति  ने   मुझे  एक दिन विस्मित कर  दिया।उसे   देखते   ही   मैंने   अपना   सुध -बुध  खो   दिया;लगा   उसे  देखता रहूँ।                    पूरे  दिन की ऊहापोह से  मैं   परेशान   था   और  ऐसे  में   शाम  को  इत्तेफाक  से  नजदीक  के  बगीचे   में   घूमने  का ख्याल  आया।परेशान   तो   था   ही  सो  घूमने  का ख्याल मन पर  तुरन्त   हावी  हो गया  और   मैं   बगीचे  की ओर निकल  पड़ा।अगले   ही   कुछ  पलो  में ...