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Showing posts with the label "क" से "कविता"

एक हारा हुआ इंसान।

Photo: Google दुनिया मे जिसने बम और बंदूके बनाई वह भी तो मानव ही था, उसका भी तो कोई समाज रहा होगा, उसके घर परिवार मम्मी-पापा रहें होंगे। मैं सोचता हूँ कई दफ़े, कि उसने बम और बंदूके बना कर, अपने किस धर्म का पालन किया? क्या वह एक अच्छा बेटा बन पाया या एक देशप्रेमी या किसी वंचित समाज का रक्षक, पता नहीं,  वह क्या चाहता था? रॉबर्ट, जिसने बस जैसे ख़तरनाक खोज की। क्या वह चाहता था कि वह कोई नवीनतम खोज करें, या वह चाहता था, उसकी बनाई बम और बंदूकों से सारी दुनिया मे वह समाज और धर्म बना दी जाए जिस समाज और धर्म में वह पैदा हुआ है? पता नहीं! वह क्या चाहता था। और वैसे भी क्या फर्क पड़ जाता है इस बात से कि, वह क्या चाहता था? उसके स्पष्ट कर देने भर से, दुनिया की इतनी हिंसा तो नहीं रुक जाती? Photo: google  फिर भी यह मान लेने के बजाए कि उसकी खोज महज एक दुर्घटना थी, मैं सोचता जाता हूँ कि, उसने बम और बंदूके क्यों बनाई? क्यों बनाई उसने ऐसा कुछ जो मानव को मानव से जोड़ने के बजाए पल भर में नष्ट कर देता है...

अकेले आये है, अकेले जाएँगे।

बहुत से लोगों को मैं जानता हूँ और उनमें बहुत से लोग मुझे भी जानते है फिर भी मैं कभी कभी अकेला बच जाया करता हूँ मेरे पास कोई नही होता और कुछ लोग पास होकर भी बहुत दूर ही होते है। मैं ऐसे बहुत से लोगों को जानता हूँ जिनसे मैं चैट कर सकता हूँ फेसबुक पे मेरे छह सौ दोस्त है फिर भी कभी कभी मैं तन्हा बच जाया करता हूँ। मैं चैट को ऑन कर देता हूँ और घण्टो उनमें झांकता रहता हूँ मैं तय नहीं कर पाता कि मैं किसको मैसेज करूँ और उधर से भी किसी का मैसेज नही आता। मेरे कांटेक्ट लिस्ट में भी बहुत से नंबर सेव है मैं उन गलियों में भी घूम आता हूँ और अंत मे उकता कर मोबाइल एक साइड में रख देता हूँ। पर तन्हाई मुझे कचोटती रहती है मैं समझ नही पा रहा होता हूँ कि क्या करूँ, फिर मैं मोबाइल उठा लेता हूँ और सोचता हूँ कि माँ को कॉल करूँ माँ,एकमात्र है जो मुझे समझ सकती है इसलिए मैं उनको भी कॉल नही करूँगा वे भाँप जाएंगी कि मैं परेशां-परेशां सा हूँ और मुझसे ढ़ेरो सवाल पूछने लगेगी मैं इस स्तिथि में हूँ नहीं कि उनके सवालों का जवाब दे सकूँ। फिर मैं स...

तकिए के नीचे का साँप।

कई दफ़े, सोने से पहले मुझे लगता है  तकिये के नीचे एक साँप है  और जैसे ही मैं उसपे सर रखूँगा वह बाहर निकलेगा और मुझे डंस लेगा। या कुछ यूं होगा कि मुझे नींद आते ही इन अंधेरों में गुम एक अदृश्य शक्ति मुझे उठाकर दूर कहीं ले जायेगी, वहाँ सिर्फ अंधेरा ही होगा ऐसा अंधेरा जिसमें हम चाहकर भी कुछ नहीं देख सकते। फिर कोई मेरे घुँघराले बाल को खींचेगा और अगले ही पल मुझे महसूस होता है कि वह मेरे बालों को काट रहा है। मैं हाथ भाजने की कोशिश करता हूँ  पर मुझे अगले ही पल पता चलता है कि मेरे तो हाथ है ही नहीं और कटे बाजुओं से गिरते खून में मेरा पूरा पीठ भींग गया है। photo : Gettey पर वह मेरी बाल को अब भी काट रहा है इसलिए मैं तुरंत ही बचे साहस के साथ अपना पैर ऊपर करता हूँ, और तब ही वह मेरे पैर को भी पकड़ लेता है और उसे ऊपर उठा कर धीरे-धीरे काटने लगता है   पैर को काटे जाने से गिरता रक्त चुता हुआ मेरे सीने पर अब जमने लगा है जिससे, अब  मैं अपने सिने पर एक भार महसूस करने लगा हूँ। मुझे उन रक्तो को अ...

"मैं सकुशल पहुंच गया हूँ और टिफिन भी मैंने खा ली है".

                1 आसमान में देखते हुए मैं सोचता था, मेरी कहानी मेरे स्तर की है जबकि मेरी हरेक कविताओं में उसका स्तर है।               2 ट्रेन के अपर बर्थ पर लेटे जब मैं आसमान को देखने की कोशिश करता तब मुझे ट्रेन की छत दिखती थी, मैं सोचता था, ट्रेन की छत में एक खिड़की होनी चाहिए जहाँ से तारों की दुनिया मे जाया जा सके।                 3 महानगर से मेरे शहर को जाने वाली ट्रेन में मेरे शहर से बहुत लोग थे, मैं उनमें ज्यादातर को नहीं जानता था जबकि महानगर से मेरे शहर के बीच, ट्रेन उनसबको जान लेने के लिए चलाई गई थी।                4 बहुत तेज चलती ट्रेन से मैं नीचे उतर जाना चाहता था जबकि ट्रेन की स्पीड बहुत ज्यादा थी, और ट्रेन में मेरी एक बड़ी बैग भी थी जिसमें मेरी प्रेमिका का दिया हुआ टिफिन रखा हुआ था।                 5 सुबह जब ट्रेन मेरे शहर पहुँचेगी, तब उतरकर मैं...

"मैं हरिया नहीं हूं!"

बहुत दूर से कोई एक आवाज आती  और मुझे लगता कोई मुझे पुकार रहा है, मैं ठहर जाता ध्यान से सुनता और उस ओर मुड़कर कर देखता, जिधर से आवाज आ रही होती कोई 'हरिया! हरिया!' पुकार रहा है। मेरा नाम हरिया नहीं है, मैं 'राजाबाबू' हूँ, पर बहुत से 'हरिया' इस दुनिया में होंगे और उनमें से एक गुम गया होगा, पर मैं जानता हूँ, मैं हरिया नहीं हूं इसलिए मैं आगे बढ़ जाता हूँ।

Doctor Himakshi

You attend a large number of patients every day,  Don't you ever want to fall ill yourself and get attended by someone just like you do too many? I do not have any knowledge of the instruments through which you work on my teeth,  Nor do I know anything about the medical terms you often tell me... I cannot even memorize them, But, what is left with me after every encounter with you are your expressions,  the swimming of your eyeballs, the dancing of your eyebrows, your face... hiding from your mask...the memory of these continue with me... I keep on replaying it in my eyes just like a musician repeating his tunes on harmonium... I am not a doctor...but even then, I want you to fall ill sometime when you are with me.  And I wish to keep a cloth soaked in warm water on your forehead, I wish to rub your sole, I wish to narrate you a poem or a prose.  I want you to take you far from this hospital, to such a place ...

एक बार में लिख दी गयी कविताएं पूरी नहीं होती.

                               1 गाँव के छोटे से हॉल्ट पर जब ट्रेन रुकती, तो लगता था गाँव मे ट्रेन सपनें भर कर लाती है और रोज यहाँ उतार कर वापस चली जाती है।                 2 सुभाष जी को लगता था, मेरी कविताएं अधूरी है "एक बार में लिख दी गयी कविताएं पूरी नहीं होती उसपे आगे भी बहुत काम करने की जरूरत होती है।"                3 लगातार बहुत स्पीड में बाइक चलाते हुए, मुझे ख्याल आया कि कहीं मैं गलत रास्ते तो नहीं जा रहा, फिर, नुक्कड़ पर बैठे लोग ने बताया कि, रास्ता सही है, NH पर आगे बढ़ते रहने को। NH इतना खूबसूरत था कि मैं आगे रास्ता पूछना ही भूल गया और चलता गया, जब मैंने रास्ता पूछा तो पता चला गलत रास्ते पर मैं तकरीबन चालीस किलोमीटर दूर निकल आया हूँ।                   4 ट्रेन जब अगले हॉल्ट पर रुकी तब एक लड़की मेरे सीट के सामने आकर बैठी उनके पास ऊन का बिना एक ब...

"मुझे रात का ख्वाब होना अच्छा लगता है"

सुबह जब सूरज आया भी नहीं होता, सारा सिस्टम मेरी कानों में चिल्लाने लगता है मेरी आँखों में ही नहीं मेरी नाक तक में पानी डाल देता है और बिस्तर से घसीट कर बाथरूम तक मुझे ले जाता है। हमेशा की तरह मेरी बीवी मेरी हाथो में टिफिन पकड़ा देती है और किसी अन्य काम में लग जाती है मैं अनमने मन से फ्लैट से नीचे उतरता हूँ, ऑटो पकड़ता हूँ और मेट्रो पहुंचता हूँ मेट्रो के सैकड़ों बेमन चेहरों में एक चेहरा मेरा भी होता है। ऑफिस में वर्षों से किए जा रहे काम को मैं दोहराता जाता हूँ, और जब तक कि सारा सिस्टम मेरे माथे से उतरकर शाम को अगली सुबह तक के लिए, मुझे आज़ाद नहीं कर देता, मैं वहीं बैठा रहता हूँ और उस पुराने डेस्कटॉप को ताकता रहता हूँ। शाम का होना मेरे जीवन में सूर्योदय के होने जैसे है जैसे जैसे अंधेरा छाता है, मेरा जेहन खिलता जाता है, और मैं ऊर्जावान महसूस करने लगता हूँ। ऐसा लगने लगता है, कि रात अपनी है, सारा आसमान अपना है। दिन की अपेक्षा, रात मुझे ज्यादा अपनी लगती है जहाँ रात के अंधेरे में, मुझे कोई अपने मन की करने से, रोक नहीं रहा होता, कोई मुझे घंटो आसमान में, झांकने से भी नहीं रोकता और न ही...