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कुवांरा चिट्ठी

(बहरहाल अपने टेबल के सामने के एक अकेला कुर्सी पर बैठे वही हो रहा था जिसका अंदाज़ा उसको पहले से था,लेकिन निश्चय ही वह दिल से यह नहीं चाहता था-वह  उसी टाइप्ड लेटर का दूसरा कॉपी पढ़ रहा था जिसका पहला कॉपी उसके हाथों में रखा सर्द खा रहा होगा।एक बार फिर एक उष्ण कल्पना जो वह अपने चिठ्ठी के लिए चाह रहा था के साथ वह अपने कुंवारे चिठ्ठी को पढने लगा-जिसकी बारात शायद फिर कभी मुकाम नहीं पायेगी.....) प्रिय,   मुझे मेरे इस शब्द के लिए माफ कर  देना।सर्वप्रथम  मैं यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि मेरा मकसद इस पत्र के माध्यम से किसी भी प्रकार से तुम्हें परेशान करना नहीं  है।आजकल  हमारे आसपास लड़कियों को लेकर घट रही घटनाओं ने मुझे तुम्हें टोकने से बार  बार   रोका।मुझे  डर था कि कहीं मुझे गलत नहीं समझ लिया  जाए।और  फिर यह डर लड़कियों के सुरक्षा हेतु आवश्यक भी  हैं।परन्तु  मेरे अन्दर कुछ ऐसी भावनाएं थी जो मुझे तुम तक  पहुचानी  थी और उस भावना को तुम तक पहुंचने से ये डर रोक न सका ।परन्तु  मैं इ...

यायावर

                                                           (भैया की एक कविता ) मंजिल की बात करते हो  मुझे तो रास्ते  भी न मिले है   तुम जिसे भटकना कह रहे हों   वस्तुतः वह मानसून का आमंत्रण हैं  अदृश्य ऊर्जा पर सवार- मेघ की यात्रा  अनंत के लिए   मै प्यासा बादल- सूखे की तृप्ति ही मेरी तृप्ति हैं  निस्संदेह मेरी मुक्ति भी. 

कमबख्त रास्ते का अजनबी.

पचास_ _साठ_ _ और फिर। मद्धम शाम की सुनसान सड़कों पर उसकी गाड़ी सत्तर किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से भाग रही थीं और उसकी आँखें लगातार तेजी से किड़े-मकोड़े की टक्कर झेलती हुई आगे देखने की कोशिश में थी।                           दूसरी ओर,किनारे को पार करता हुआ मेढ़क सड़क के लगभग बीचोबीच पहुंचा ही था कि उसकी नज़र मेढ़क पर जा टिकी।उसे लगा कि वह बगल से निकाल लेगा और तभी मेढ़क गाड़ी के चक्के के ठीक सामने आ गया। गाड़ी और मेढ़क के बीच फासला लगभग साढ़े पाँच फुट की।और गाड़ी तेजी से आगे बढ़ती हुई।फासला घटता हुआ और कमबख्त मेढ़क बीच सड़क पर स्थिर बैठा। और फिर वह सिधा मोटर साइकिल के अगले ब्रेक को लेता हुआ पिछले ब्रेक पर खड़ा हो गया। ...........................मोटर साइकिल की लाईट अब भी जल रही थीं।मोटर साइकिल में फसे पैर को निकालते हुए व माथे की चोट को मलते हुए,मोटर साइकिल की हल्की रोशनी में उसने देखा कि मेढ़क अब भी वहीं बैठा हुआ उसकी ही ओर देख रहा है।

ओह!!सिट।

परीक्षा के परिणाम आ गए  थे;मैंने   पूरे   सौ  प्रतिशत  अंक  प्राप्त  किए।मुझे   अपने  स्कूल  में   बुलाया   गया,वहाँ  जहाँ कल तक स्कूल के  सभी  शिक्षक  मुझे   जानते  तक  नहीं   थे   और  आज  सभी  मेरी प्रशंसा  करते   नहीं   थक  रहे  थे।खुद   कभी   अपने  कार्यालय से  बाहर  न  निकलने  वाले प्रधानाध्यापक  ने   मुझे  आगे आकर  बच्चों  के  सामने   कुछ   बोलने  को  कहा।हजार  से ज्यादा अलग-अलग कतार  में   खड़े   बच्चों   ने   मेरे   माईक   थामते   ही  जोरदार  तालियों  से मेरा स्वागत  किया।मानो   मैंने   सौ  प्रतिशत से भी ज्यादा  अंक  प्राप्त  किए   हो। मैनें   बच्चों  के  सामने   कुछ  न बोल पाने की  असमंजस  को  तोड़ते   हुए ...