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"हम जिन चीज़ों को नहीं जानते, नहीं महसूस कर पाते उसे सबसे ज़्यादा क्रिटीसाइज़ करते है"

ये बातचीत हाल ही में     thegirl_film  के लिए हुए तीन दिवसीय प्रोग्राम "गोंतरी" से ली गयी है जब आर्यन अपनी बात रखने खजूराहों गए थे. कार्यक्रम का आयोजन सुहानियो के प्रयास से हुआ था जिसमें देश के अलग अलग हिस्सों से लगभग पंद्रह से ज़्यादा लोगों ने भाग लिया. बातचीत का यह हिस्सा सेसन में बताए गए आर्यन के अनुभव व बाद के उनसे कुछ ज़रूरी सवाल जवाब पर आधारित है और पूरी तरह व्यक्तिगत है. आर्यन, आपने कहा कि आपने अपनी जीवन में केवल मैकलोडगंज की यात्रा की जो टूरीस्ट स्पॉट थी. इसके बाद आप कभी ऐसी जगहों पे नहीं गए. तो ऐसी जगहों से आपका क्या मतलब है? मैंने अपना एक लम्बा वक़्त दिल्ली में रहते हुए आर्ट के अलग अलग माध्यम को समझने में लगाया था और जब मेरे अंदर यात्रा करने की इक्छा जगी तो ऐसा था कि मैं यात्रा अपनी तरह की आर्ट को समझने के लिए करना चाहता था. वो कुछ था जिसके लिए मुझे एक माध्यम या कहें कि आवाज़ की ज़रूरत थी. और कई तरह के आर्ट फ़ेस्ट में घूमते जाते हुए मानसिक तौर पर मैं बहुत यात्रा कर चुका था पर जब मैंने शारीरिक तौर पर यात्रा शुरू किया तो संयोग से दोस्तों के साथ मै...

एक हारा हुआ इंसान।

Photo: Google दुनिया मे जिसने बम और बंदूके बनाई वह भी तो मानव ही था, उसका भी तो कोई समाज रहा होगा, उसके घर परिवार मम्मी-पापा रहें होंगे। मैं सोचता हूँ कई दफ़े, कि उसने बम और बंदूके बना कर, अपने किस धर्म का पालन किया? क्या वह एक अच्छा बेटा बन पाया या एक देशप्रेमी या किसी वंचित समाज का रक्षक, पता नहीं,  वह क्या चाहता था? रॉबर्ट, जिसने बस जैसे ख़तरनाक खोज की। क्या वह चाहता था कि वह कोई नवीनतम खोज करें, या वह चाहता था, उसकी बनाई बम और बंदूकों से सारी दुनिया मे वह समाज और धर्म बना दी जाए जिस समाज और धर्म में वह पैदा हुआ है? पता नहीं! वह क्या चाहता था। और वैसे भी क्या फर्क पड़ जाता है इस बात से कि, वह क्या चाहता था? उसके स्पष्ट कर देने भर से, दुनिया की इतनी हिंसा तो नहीं रुक जाती? Photo: google  फिर भी यह मान लेने के बजाए कि उसकी खोज महज एक दुर्घटना थी, मैं सोचता जाता हूँ कि, उसने बम और बंदूके क्यों बनाई? क्यों बनाई उसने ऐसा कुछ जो मानव को मानव से जोड़ने के बजाए पल भर में नष्ट कर देता है...

अकेले आये है, अकेले जाएँगे।

बहुत से लोगों को मैं जानता हूँ और उनमें बहुत से लोग मुझे भी जानते है फिर भी मैं कभी कभी अकेला बच जाया करता हूँ मेरे पास कोई नही होता और कुछ लोग पास होकर भी बहुत दूर ही होते है। मैं ऐसे बहुत से लोगों को जानता हूँ जिनसे मैं चैट कर सकता हूँ फेसबुक पे मेरे छह सौ दोस्त है फिर भी कभी कभी मैं तन्हा बच जाया करता हूँ। मैं चैट को ऑन कर देता हूँ और घण्टो उनमें झांकता रहता हूँ मैं तय नहीं कर पाता कि मैं किसको मैसेज करूँ और उधर से भी किसी का मैसेज नही आता। मेरे कांटेक्ट लिस्ट में भी बहुत से नंबर सेव है मैं उन गलियों में भी घूम आता हूँ और अंत मे उकता कर मोबाइल एक साइड में रख देता हूँ। पर तन्हाई मुझे कचोटती रहती है मैं समझ नही पा रहा होता हूँ कि क्या करूँ, फिर मैं मोबाइल उठा लेता हूँ और सोचता हूँ कि माँ को कॉल करूँ माँ,एकमात्र है जो मुझे समझ सकती है इसलिए मैं उनको भी कॉल नही करूँगा वे भाँप जाएंगी कि मैं परेशां-परेशां सा हूँ और मुझसे ढ़ेरो सवाल पूछने लगेगी मैं इस स्तिथि में हूँ नहीं कि उनके सवालों का जवाब दे सकूँ। फिर मैं स...

तकिए के नीचे का साँप।

कई दफ़े, सोने से पहले मुझे लगता है  तकिये के नीचे एक साँप है  और जैसे ही मैं उसपे सर रखूँगा वह बाहर निकलेगा और मुझे डंस लेगा। या कुछ यूं होगा कि मुझे नींद आते ही इन अंधेरों में गुम एक अदृश्य शक्ति मुझे उठाकर दूर कहीं ले जायेगी, वहाँ सिर्फ अंधेरा ही होगा ऐसा अंधेरा जिसमें हम चाहकर भी कुछ नहीं देख सकते। फिर कोई मेरे घुँघराले बाल को खींचेगा और अगले ही पल मुझे महसूस होता है कि वह मेरे बालों को काट रहा है। मैं हाथ भाजने की कोशिश करता हूँ  पर मुझे अगले ही पल पता चलता है कि मेरे तो हाथ है ही नहीं और कटे बाजुओं से गिरते खून में मेरा पूरा पीठ भींग गया है। photo : Gettey पर वह मेरी बाल को अब भी काट रहा है इसलिए मैं तुरंत ही बचे साहस के साथ अपना पैर ऊपर करता हूँ, और तब ही वह मेरे पैर को भी पकड़ लेता है और उसे ऊपर उठा कर धीरे-धीरे काटने लगता है   पैर को काटे जाने से गिरता रक्त चुता हुआ मेरे सीने पर अब जमने लगा है जिससे, अब  मैं अपने सिने पर एक भार महसूस करने लगा हूँ। मुझे उन रक्तो को अ...

गोली मार लूँ या मार दूँ।

बहुत पुरानी घटना नहीं है। साल  2018   की कोई शाम थी। अक्टूबर का महीना था और मैं अपनी उत्तर - पूर्व भारत की महत्वकांक्षी यात्रा पे था। कमोबेस भारत भर में केवल यह कुछ प्रदेश ही ऐसे थे , जहाँ मैं अभी तक भ्रमण नहीं कर पाया था। इसलिए एक लम्बे वक़्त की तैयारी के साथ मैं निकला था और उन दिनों सिक्कीम में था। तभी किसी संध्या घर से जानकारी मिली थी कि नानी की तबियत बहुत ज़्यादा बिगड़ गयी है और उन्हें हॉस्पिटल ले जाया गया है।   मैं पूरी रात सोते - जागते नानी के बारे में ही सोचता रहा। बचपन से नानी यहाँ आता जाता था , पर कभी यह नहीं समझ पाया कि वह मुझे और मेरी माँ को ही नहीं बल्कि एकसाथ वह अपने  सारे  नातियों को इतना ज़्यादा स्नेह कैसे कर लेती है ! जैसे ही मैं ननिहाल पहुँचता , नानी देखरेख में पूरा घर अपने माथे पे उठा लेती। वह अपनी बेटी तक को कुछ न करने देती। यह सब कभी - कभी इतना ज़्यादा हो जाता कि मैं विशेष टाइम ले...