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तुम्हें नंगा नाच नचाया जाएगा, तुम भागना चाहोगे पर भाग नहीं पाओगे.

तुम सारे दीवालों को पोत दो, इन तीन रंगों से सड़के, आसमान और यहाँ तक की हवा को भी रंग दो इन तीन रंगों से। शहर, गांव और नगर के हरेक नुक्कड़ तक का नाम बदल दो और रख दो वह नाम जो तुम्हारे हिसाब से देशप्रेम का प्रतीक हो। हरेक का नाम भी बदल दो नदी, नक्स, पेड़ जंगल सब का नाम बदल दो और बना दो एक कानून की हरेक जन्मने वाले का नाम भी देशप्रेम रख दिया जाए। Photo #ACP उसे कपड़े देशप्रेम की पहनाया जाए उसे कहानी देशप्रेम की सुनाई जाए और स्कूल में भी उसे केवल देशप्रेम की ही शिक्षा दी जाए। तुम यह भी कानून बना दो कि लोग केवल देशप्रेम की ही बातें करें देशप्रेम की रचना करें देशप्रेम की गीत गाए देशप्रेम की सिनेमा बनाए और देशप्रेम की बात चले तो सम्मान पूर्वक, वह खड़ा हो जाए। और जो भी ऐसा न करें उसे सरे राह सूली पे चढ़ा दो एक भीड़ को तैयार कर दो जो सारे आम तुम्हारी इस सड़ी हुई मानसिकता को ढ़ो सके, उसे सह दे सके। बीते हज़ारो सालों में ऐसा नहीं हुआ, फिर भी देश चलता रहा देशप्रेम की भावना बरकरार रही, पर तुम कुछ उच्चक्के ऐसे थे, जिसने इस भावना को महसूस ही नहीं किया जिसे समझ...

बिहार उत्सव : ये कलाकारों से मिलने का भी मेला है.

कुसुम जी कहती है  “हम अपनी परवरिश के दौरान जिन चीज़ों को अपने आसपास घटते देखते है, उसका हमारी चेतना पर गहरा असर होता है। मिथिला पेंटिंग की खूबसूरती भी इसी से बरकरार है। और हम महिलाओं ने इसको और भी खूबसूरती से रचा बसाया है।”  दिल्ली हाट के  “बिहार मेला”  में मेरे लिए मुख्य आकर्षण मिथिला पेंटिग्स रही। आज से पहले तक लगता था कि मिथिला पेंटिंग का मुख्य केंद्र ही रामायण की अलग अलग कहानियाँ है। पर आज इस मेले में भ्रमण के दौरान मिथिलांचल की विभिन्न पेंटिग्स को देख पाया जिनका विषय महज रामायण न होकर मिथिला संस्कृति की अन्य झलकियाँ भी थी। कुसुम जी राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता है। और उन्होंने पेंटिंग्स के गुर अपनी सासु माँ से सीखा। वह कहती है कि “अपने परिवार में रहते हुए मैंने पेंटिग नहीं की क्योंकि वहाँ ऐसा माहौल नहीं था। बाद में शादी के बाद मैंने इसे अपनी सासु माँ से सीखा।” और इस तरह मिथिला क्षेत्र से बाहर जानेवाली लड़कियां और शादी के बाद मिथिला क्षेत्र में आने वाली महिला परंपरागत रूप से इस कला को जीवित रखे हुए है। इसी संदर्भ में यह बात बेहद उपयुक्त लगती है कि महिलाएं क...

पागल खुद की भी कहां सुनता है!

Photo #ACP गली के नुक्कड़ का दुकानदार रोज सुबह-सुबह दुकान खोलकर बैठ जाता है देर रात गए तक वह वहीं बैठा होता है गली के एक छोड़ से मुख्य सड़क तक ले जाने वाला ऑटो ड्राइवर भी सुबह से शाम तक ऑटो चलाता रहता है और ऑटो में एकजैसे गाना ही बजाता है। और वो सब्जी वाला सुबह और शाम दोनों ही वक्त एक ही जगह अपनी दुकान लगाता है। रोज ऑफिस मैं एक ही रास्ते से जाता हूँ और लगभग तय समय तक घर वापस आ जाता हूँ फिर कभी कभी मेरा मन होता है कि, मैं घर से निकलूं और मेट्रो स्टेशन पर जमकर डांस करूँ और सब उदास चेहरे जैसे अचानक से खिलखिला उठे अपना बैग, टाई और जूता सब फेक दूँ या अचानक से मेट्रो में चिल्लाने लगूं और मेट्रो की वो लाल बटन झट से दबा दूँ कि सब ऑफिस जा ही न पाए और वहीं खड़े होकर एकदूसरे से पूरे दिन बात करते रहे। ऑफिस से लौटते वक्त शाम को जैसे मन होता है कि जूता वहीं सड़क पर खोलकर दूर तक पैदल चलता जाऊं और किसी अजनबी वन वे रास्ते पर निकल जाऊं जो इस शहर से दूर ले जाती हो सुबह रोज मैं ट्रैफिक में फंसता हूँ और सोचता हूँ कि अगली सुबह घर से जल्...

डॉक्टर नहीं हूँ !

कितनों का तो रोज इलाज करती हो तुम कभी तुम्हारा मन नहीं होता कि बीमार पड़ जाऊं और तुम्हारा भी कोई वैसे ही देखभाल करें जैसे तुम कइयों का करती हो ? Photo #ACP तुम्हारे इंस्ट्रूमेंट्स जिनसे तुम मेरी दांतो का इलाज़ किया करती हो या बात बे बात मेरे पूछने पर जिन मेडिकल टर्म्स के बारे में मुझे बताया करती हो, मुझे उसका कोई ज्ञान नहीं और  यक़ीनन मैं उन टर्म्स को याद भी नहीं रख पाता पर याद रह जाती है मुझे तुम्हारी वो हरेक एक्सप्रेशन तुम्हारी आँखों का तैरना और तुम्हारी भौंह का वो सुन्दर नृत्य मास्क से बाहर झांकती तुम्हारा चेहरा सब याद रह जाता है मुझे और मैं खुद में ही उन्हें ऐसे रिप्ले करता रहता हूँ जैसे कोई हारमोनियम पे राग छेड़ रहा हो। डॉक्टर नहीं हूँ मैं  फिर भी चाहता हूं कि कभी तुम मेरे पास बिमार पड़ जाओ और मैं तुम्हारी माथे पे गर्म पट्टी रखा करूँ तुम्हारी तलवे को सहलाते हुए तुम्हें कोई कविता सुनाऊं कोई कहानी सुनाऊं। या तुम्हें हॉस्पिटल के इस माहौल से दूर कहीं किसी ऐसे जगह पे ले जाऊं जो बसता हो तुम्हारी ख्...

बिछोह

Photo - #ACP अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें।। ~  #अहमद_फ़राज़ #ACP   #ImagethroughmyEyes

खोपड़ी है, शोर तो करेगा.

....और फिर वह दौड़ता हुआ बाहर आया और बिना कुछ बोले टोपी मेरे हाथ में पकड़ा चला गया। अंदर से लौटते हुए मैं अपना टोपी मोनेस्ट्री में ही भूल आया था। जब मैंने मोनेस्ट्री में प्रवेश किया था, तब वहां एक बड़े से हॉल में प्रार्थना हो रही थी। मैं भी वहाँ बैठ गया। मेरे आसपास बहुत से कम उम्र के बच्चे थे। और सामने बुद्ध का एक बड़ा सा प्रतिमा। सभी एक साथ कुछ बोल रहे थे। बच्चों के सामने एक किताब भी थी। पाली भाषा में। कुछ भी समझ पाने के जद्दोजहद में दिमाग प्रश्नों से भर ने लगा। मसलन इन कम उम्र के बच्चों को धर्म की शिक्षा देना क्या सही है? इन बच्चों ने अपनी राह खुद ही क्यों नहीं ढूंढी? या क्या अब तमाम उम्र ये बच्चों उन्हीं सत्य को मानेंगे जिसे बुद्ध ने सत्य कहा, और क्या ये बच्चें तमाम उम्र बुद्ध के फॉलोवर मात्र बनकर रह जाएंगे? दिमाग बहुत चंचल होता है, जहाँ जो कुछ देखता है सवाल खड़े करता है। बुद्ध ने भी कहा है प्रश्न करना जरूरी है। सवालों के तह से ही रास्ता खुलेगी। पर सवाल मन की शांति का है, प्रश्न मन को अशांत करता है। अंदर कौतूहल पैदा करता है। फिर आगे? पता नहीं। बोध गया के मु...

मन

"अब एक ही मन के दो जिस्म है दुनिया में। एक मैं और दूसरी वह" # ACP  

संकरी गली

_गली को इतना संकरा नहीं होना चाहिए कि दो प्रेमी वहां इश्क़ की नींद ही न सो सके_ #ACP   #ImagethroughmyEyes

हज़ार जोड़ी आँखें

मरने से ठीक पहले उसकी एक जोड़ी आँखें हजार जोड़ी आँखों में बदल गयी। और उसने सैकड़ो जोड़ी बाँहों को भी  खुद से जुड़ते महसूस किया, मरने से ठीक पहले, वह ! एकसाथ सबको अपनी   आंखों  और  बाँहों  में  समेट लेना चाहता था।
Photo - #ACP _और अगर हज़ार जोड़ी आंखें होती, तो भी ये तुम्हें देखना ही पसन्द करती_ #ACP   #ImagethroughmyEyes
Photo - #ACP चाँद अब कितना दूर दिखता है मुझे, जबकि अभी अभी वह मेरे पास से उठकर गया है। #ACP   #ImagethroughmyEyes
Photo - #ACP "मौसम का एहसान है, कि तू मेरा मेहमान है" #ACP   #ImagethroughmyEyes
Photo - #ACP _तुम्हारे जाने के बाद आने तक बहुत सी बातें इकट्ठा हो जाती है इसलिए मैं बहुत बोलता हूं_ # ACP   # ImagethroughmyEyes
【_बाहर का अंधेरा खिड़की से, अंदर आ गया था, जबकि खिड़की बंद थी_】 अब घंटे भर से चाँद भी हमारे साथ चल रहा था। बस के शीशे से बाहर एक दुनिया दिख रही थी, जिसके ऊपर चाँद चुपचाप स्थिर बैठा था। और उसके दूधिया रोशनी में बस की खिड़की से ऐसा जान पड़ता था कि मैं कोई ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म देख रहा हूँ। फिर मुझे लगा कि बस का ड्राइवर जो पिछले छह घंटे से भी ज्यादा समय से बस को चला रहा है, कहीं वह भी तो यह फ़िल्म देखने न लग गया और इसलिए बस का लाइट ऑन करना ही भूल गया हो। मैं अपने केबिन में बैठा बाहर देख रहा था जब उजाला थी।पता नहीं अंधेरा कब बाहर से अंदर आ गयी और मुझे पता ही न चला जबकि बस की खिड़की पूरी तरह बंद थी। Photo - #ACP

【 मैं तुम्हारा हिस्सा हूँ 】

कहां-कहां से मिटाओगी मुझे अपने फेसबुक के वॉल से हटा दोगी डायरी के पन्नों से उन एक एक शब्द को काट कर दूर फेक दोगी जो तुमने मेरे बारे में लिखा है, अपनी उन सारी फोटोज को भी जला डालोगी जिसे मैंने क्लिक किया है? पर उन स्पर्शों का क्या जो आज भी तुम्हारी जिस्म पर मेरी एहसास बनकर रेंगती होगी। Photo - #ACP क्या तुम उन तमाम रातों को भी मिटा पाओगी, जो तुमने मेरी आँखों में जागकर बिताए है? मुमकिन होगा तुम्हारे लिए, उन शब्दों को फिर से   अपने किसी नए प्रेमी के लिए गढ़ना जिसे तुम मेरे लिए कभी गढ़ा करती थी? और आज भी   तुम आईने के सामने खड़ी होकर जब माथे के उस छोटे से गड्ढे के बीच बिंदी टिकाती होगी तब भी क्या, इस एहसास को भुला पाती होगी कि, मैं ठीक तुम्हारे पीछे खड़ा हो तुम्हें निहार रहा हूँ? और क्या अब भी तुम चाँद को, वैसे ही देखती रहती हो घण्टो? याद है तुम्हें जब यूँ ही चाँद को रात भर देखती हुई तुम कहती थी मुझसे   "मैं रात भर तुम्हें देखती रही" क्या तुमने उन रातों को भी भुला दिया है? मुमकिन है, तुम्हारे लिए आसान रहा हो   यादों को भुला पाना, या आज भी...

तेरा खून है सौ में नब्बे काला.

यह कल (19 फरवरी) देर रात की घटना है, दिल्ली सरकार द्वारा आयोजित उर्दू हेरिटेज फेस्टिवल से मैं अपने कुछ दोस्तों के साथ लौट रहा था। हम लोग राजीव चौक से करोल बाग की तरफ जाने वाली सड़क पर टहल रहे थे कि अचानक हमें कहीं से किसी लड़की के चीखने की आवाज़ सुनाई दी। सड़क सुनसान ही थी और एकाध लोग ही आस-पास थे। हम सभी दोस्त इधर-उधर कौतूहल भरी नज़रों से देखने लगे। हमने देखा कि एक ऑटो हमारी तरफ आ रहा है, लड़की के चीखने की आवाज़ भी ऑटो के अंदर से ही आ रही थी। हम आंखें फाड़कर ऑटो के अंदर देखने की कोशिश करने लगे और ऑटो एक पल में आंखों से ओझल हो गया। हमने केवल इतना देखा था कि ऑटो के अंदर बैठी लड़की किसी से हाथ छुड़ाने का प्रयास कर रही थी और ज़ोर-ज़ोर से चीख रही थी। अब चूंकि ऑटो के अंदर अंधेरा भी था तो दृश्य के बारे में निश्चित रूप से कुछ कहा नहीं जा सकता, सिवाय इसके कि लड़की के चीखने की आवाज़ ही दृश्य को समझने के लिए पर्याप्त थी। हममें से एक दोस्त ने जल्दी से पुलिस को कॉल कर दिया। जब तक ये सब नहीं हुआ था, हम सभी खूब मस्ती कर रहे थे और जैसे ही यह घटना घटी, रात की सन्नाटे में हमारी मस्ती भी शांत पड़ गई। जैसे अब...

माँ।

【माँ घर के अंदर ही रहती है बाहर, सिर्फ माँ की यादें होती है।】 कितनी-कितनी बार मैंने कहा है माँ से बाहर चलने को, पर हर बार माँ टाल दिया करती कहती, "कितना काम पड़ा है।" हमेशा माँ ऐसा ही कहती थी मैं जिद्द करता फिर भी, वह यही कहती। माँ घर के अंदर ही रहती बाहर, सिर्फ माँ की यादें होती है। दिनभर से लेकर देर रात तक माँ घर भर में ही इधर से उधर भागती रहती और अगले दिन तड़के सुबह ही जग कर घर बुहारने लग जाती। घर के छोटे से बड़े बुहारने से लेकर पुताई तक का काम मां ही करती थी कौन से खेत में क्या बुआई करनी है और कटाई के वक्त तक मे भी सबपर माँ ही ध्यान देती। पर कभी भी उन्होंने चारदीवारों से बाहर कदम नहीं रखा। माँ ने अपनी दुनिया चारदीवारी में ही बसा लिया था उन्हें देख लगता था, मेरी बाहर की दुनिया भी कितनी छोटी है पर उन दीवारों के बीच रहते हुए ही माँ ने मुझे बाहर के तौर तरीके सिखाए चारदीवारों से ऊपर की आसमां में उड़ने का हौसला दिया और ढ़ेर सारे सपने दिए। जिनपर सवार हो मैं बहुत दूर निकल आया इतनी दूर क...

मोनालिसा

और देर सुबह जब मैं जगता पाता कि, अपने हिस्से का बिस्तर सही कर मेरे माथे तक कम्बल खीच वह बिस्तर पर नहीं है। मैं आंख मिजता हुआ बिस्तर पर उठ बैठता और कुछ देर इधर उधर देखने के बाद भी जब मेरी नजरें उसे नहीं ढूंढ़ पाती तो मैं आवाज लगाने लगता "मोना....वो मोना... ....कहाँ चली गयी?" और जब कमरों से गूंजती मेरी आवाजें उसकी कानों से टकराती, वह वहीं बाथरूम से कहती "आयी...बस एक मिनट..." उसकी आवाज मेरी कानों में किसी सरगम सी पड़ती, और सहसा ही मेरा ध्यान, कमरे की ओर चला जाता हफ़्तों से बिखड़ी किताबें, कपड़ें, और भी न जाने क्या क्या सब किसी न किसी जगह पर सजी होती भले ही उन्हें उनकी जगह पर नहीं रखा गया होता पर वे सब कहीं न कहीं ऐसे रखी होती  जैसे वहीँ उसकी उपयुक्त जगह थी मैं कहता उससे, जब बाथरूम से बालों में तौलिया लपेटे, वह बाहर आती "क्यों करती हो इतना, क्या जरूरी थी कमरा साफ करने की?" वह मुस्कुराती और बिना कुछ बोले ही छत की ओर चली जाती। मैं एकटक उसे जाते हुए देखता रह जाता। बहुत दिन बीत गए उसे...
Photo #ACP "तो क्या प्लानिंग है वैलेंटाइन की?" "कुछ खास नहीं!" "फिर भी, क्या कुछ खास कर रहे हो अपनी प्रेमिका के लिए?" "उन्हें प्यार कर रहा हूँ इससे खास और क्या हो सकता है!" # ACP  #ImagethroughmyEyes

एक सांस्कृतिक उत्सव का खात्मा!

पिछले तीन संडे से यह मार्केट बंद है। पहले कहा जा रहा था कि गणतंत्र दिवस के बाद फिर से यह मार्केट लगने लगेगा पर ऐसा नहीं हुआ। हर संडे को पुस्तक प्रेमियों से भरा रहने वाला यह मार्केट लगातर पिछले कुछ संडे से बंद पड़ा है। बात हो रही है दिल्ली के दरियागंज संडे बुक मार्केट की। दरियागंज में प्रत्येक संडे को लगने वाला पुस्तक मेला या यूं कह लीजिए कि बुक मार्केट अपने आप में एक सांस्कृतिक उत्सव जैसा रहा है जो पिछले पचास वर्षों से भी अधिक समय से चलता आ रहा था। प्रोफेसर शिव विश्वनाथन कहते हैं “यह मार्केट ऐसा मार्केट है जहां रेयर से रेयर किताबें आराम से मिल जाया करती हैं, जो अलग-अलग लाइब्रेरी तक में नहीं ढूंढी जा सकती।” मुझे याद है जब मैं पहली बार दरियागंज बुक मार्केट, संडे को सुबह-सुबह पहुंच गया था, भीड़भाड़ तो थी पर उतनी ही लापरवाही से डिलाइट सिनेमा हॉल से लेकर जामा-मस्जिद तक किताबें बिखरी पड़ी थी। एक से एक किताबें, हर कैटेगरी की। शायद इसलिए भी यहां हर तरह के लोग आते थे। जिन किताबों को बाहर ढूंढना तक मुश्किल होता है, वे किताबें यहां थोड़ी मशक्कत के बाद सस्ते रेट पर मिल जाया करती थी। Photo ...