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तुम नहीं समझोगी

जब हर बार थक जाता है जिस्म नींद की आगोश में जब ऊब सा जाता है बदन सोये-सोये यूँ ही खोए से तब कुछ देर के लिए ही सही यह दूरी मिलों लंबी जान पड़ती है लगता है एक-एक पल एक अरसा सा है जिसमें मैं निरंतर जलता जा रहा हूँ।। नींद की यह अपनी खूबी है कि वहाँ कोई सीमा नहीं ना ही कोई बंधन है।। तुमने आज संदेशा भिजवाया है कि तुम शनिचर की संध्या पे मिलोगी पर मैं तुम्हें कैसे बताऊँ कि आज तो मंगलवार ही है।। क्या तुम कभी मंगलवार से शनिचर के बीच की दूरी को समझ पाओगी तुम गणित लगा पाओगी कि इन दिनों में कितने घंटे होते है और उन घंटो में कितनी मिनटे होती है और क्या ये भी महसूस कर पाओगी कि उन प्रत्येक मिनट के हर एक सेकंडों में मैं कैसे जलता हूँ? और क्या तुम मेरे शरीर के उस ताप को सहन कर पाओगी? जब तुम आओगी तब यह ताप मिश्रित सुख की ठंडक में बदल चुका होगा जिसकी छाव में बैठकर हम घंटों बातें करेंगे मैं भूल जाऊंगा कि तुम्हारे विरह में मैं कैसे जल रहा था मैं यह भी भूल जाऊंगा कि अब से कुछ ही देर बाद तुम चली जाओगी और फिर से वही आग मुझे झुलसायेगी ...

कभी तो तुम भी कुछ बोलोगी !

अक्सर मैं तुमसे कुछ सुनने के लिए बहुत ज्यादा बोल जाता हूँ मैं बोलता जाता हूँ कि, तुम भी बोलोगी और तुम सुनती जाती हो सिवाय अच्छा है, बढ़िया है कहने के। अक्सरहां जब भी मैंने तुम्हें मैसेज किया है यही उम्मीद किया है कि आज मैं जी भर के तुम्हें सुनूँगा पर उम्मीदों का स्तर भी तो हम तक ही सीमित होता है इसलिए कभी तुम मेरी इस उम्मीद को पूरी नहीं कर पाई फिर भी मैं आज भी आशांवित हूँ किसी दिन तुम जी भर कर बोलोगी और मैं तुम्हारा श्रोता होऊँगा सिवाय यह कहने के कि अच्छा है बढ़िया है।। कोई किसी को क्यों सुनना चाहता है मेरे लिए यह प्रश्न अब महत्वपूर्ण नहीं रह गया है बल्कि इसके कि कोई किसी के सामने खुलता क्यों नहीं वह अपने सुख-दुख क्यों नहीं बाँटना चाहता निश्चित ही मैं तुम्हारा कल का बना दोस्त नहीं हूँ और न ही वर्षों से तुम्हें जानने वाला कोई शख्स पर मैं तुम्हारा प्रेमी हूँ जो तुम्हारे बारे में ही जानना चाहता है उसके लिए देश दुनिया अब उतना ही पराया है जितना कि किसी विरही के लिए दूर का कोई गाँव और सबकुछ मैं तुम्हीं से जान लेना चाहता ...

बाली

किसी जन्म में मैं तुम्हारी कानों की बाली रहा होऊँगा फिर कभी कुछ यूं हुआ होगा कि तुम्हारी जुल्फ़े बाली में फस गई होगी और फिर तुम जुल्फों को छुड़ाने के लिए जितना खीचती हो मैं उतना ही दूखता हूँ।।

चुड़ैल

रात का कोई तीसरा पहर रहा होगा।मुझे याद है पिछले तीन-चार सालों में मैं कभी इस पहर में नहीं जागी थी और अगर संयोग से जग भी गयी थी तो उठ कर बाहर नहीं आ गयी थी। तो उस रात मैं जग कर टॉयलेट की ओर बढ़ गयी थी।देर रात को जब भी सोने जाती थी तो देखती थी कि टॉयलेट की लाइट जल रही है।वहां कोई स्विच नहीं होता था कि लाइट को बंद किया जा सके।इसलिए टॉयलेट की लाइट पूरी रात जलती ही रहती। तो उस दिन भी टॉयलेट की लाइट जल रही थी पर रात का तीसरा पहर था न ! टॉयलेट की लाइट टॉयलेट की चौखट न लाँघ पाई थी।मैं जैसे ही चौखट के ठीक पहले तक पहुंची थी मेरा पैर एक सिर से टकराया था और पैर कुछ बालों में उलझ गए थे।मैं सीधा कमरे की ओर भागी थी पर लगा था कि वह सर मेरे साथ तक कुछ दूर तक खिंचा आ गया था। मैं कमरे में आ तो गयी थी पर मुझे नींद न आयी।लगा जैसे वहां कोई चुड़ैल थी।अगले दिन मुझे पीजी छोड़ देना था और यह पिछले तीन साल पहले ही तय कर लिया गया था।मैं सुबह सुबह चुपचाप चली आयी थी पर उस रात को वहां नहीं छोड़ पायी।वह भी साथ आ गयी।

सोया हुआ आदमी

जब सोया हुआ आदमी नींद की आगोश से जगा दिया जाता है तो भी क्या वह सपनो से बाहर आ पाता है सोने से पहले और सोने के बाद कि दुनिया में सपनों का एक संसार बसता है क्या आदमी कभी उससे मुक्त हो पायेगा या तमाम उम्र उन सपनों की लकीरें उसका पीछा करती रहेगी आदमी आधा जिंदगी जाग कर और आधा जिंदगी सोकर बिता देता है पर क्या उन जागे हुए जिंदगी में भी वह जगा होता है? या जागते हुए भी वह अपने देखे सपनों की ही दुनिया मे होता है उसका देखा सपना ही उसका संसार है बाकि जो वो देख रहा है वह तो किसी और की ख्वाबों का बासिन्दा है।

'धत्त!, उसे बंडी नहीं,कोटि बोलते है'

'अच्छा सुनो न' 'हां जी, कहिये न' 'वो जो तुमने आज पहना था न, उसमें तुम काफी खूबसूरत लग रही थी' 'अच्छा, क्या पहनी थी?' 'वही,जो सलवार के ऊपर पहनी थी न!' 'अरे क्या?' 'बंडी' 'बंडी?' 'हाँ' 'धत्त!, उसे बंडी नहीं,कोटि बोलते है'

घर

घर केवल इसलिए तो नहीं होता कि लौटकर शाम को आया जा सके कई दफ़े मैं सुबह निकल कर घर से बहुत दूर चला जाता हूँ इतना दूर कि लौटने की इक्छा ही नहीं होती पर देर सबेर घर अपने पास बुला ही लेती है घर एक जरूरत है बहुत सारी संभाली हुई जरूरत के पास लौट आने की जरूरत।। #ACP

'ऐ मोना! कुछ बोलो न!'

और उस दिन फिर से मिलने को आतुर प्रेमी ने अपनी प्रेमिका को कॉल किया "मोना,आज आओगी न मिलने" और उधर से प्रेमिका ने वही कहा जो वह दो दिन से कहती आ रही थी "आज भी न मिल पाऊँगी, घर पर बहुत काम है" "अच्छा!" प्रेमी ने बुझे मन से कहा।उसे आगे कुछ सूझ नहीं रहा था कि क्या बोले।पर वह बोलना चाहता था,सुनना भी चाहता था क्योंकि वह जानता था एक बार कॉल कट जाने के बाद वही विरह की अग्नि। कुछ देर तक तो दोनों एकदूसरे की खामोशी ही सुनते रहे।फिर प्रेमिका ही बोली "दो दिन पहले ही तो मिली थी,फिर काम खत्म होते ही आऊंगी न!" "दो दिन पहले! पता है,मोना।दो दिन में कितने पहर होते है।और उन पहरों में कितनी लम्हा होती है...."। प्रेमिका कुछ न बोली।उसने केवल अपने बेचैन प्रेमी की धड़कने सुनी। "....और मोना! अगर उन एक-एक लम्हों में हज़ार-हज़ार बार भी मेरी धड़कने धड़कती है तो तुम अंदाजा लगा पाओगी कि कितना बेचैन होता हूँ मैं तुम्हारे बगैर" प्रेमिका ने इस बार भी कुछ नहीं कहा। 'ऐ मोना! कुछ बोलो न!' "क्या बोलूं?" "कुछ भी,जो भी ...

मोना_लिसा

मैं किसी दिन यूं ही तुम्हारी धड़कने बन जाना चाहता हूं और चाहता हूँ तुम्हारी सीने में धड़कता रहूँ तुम जितनी भी सांसे लो ऑक्सीजन के हर उस कतरा में मैं बस जाऊ मैं चाहता हूँ कि वह दृश्य बन जाऊं जिसे देखना तुम्हें सबसे ज्यादा पसंद हो मैं हर एक उस गीत का बोल बन जाना चाहता हूं जो तुम गुनगुनाती हो। मैं ठीक वैसा ही बन जाना चाहता हूं जैसा कि कोई ख़्वाब बसता है तुम्हारी सपनों में और फिर,एकदिन मैं वह हकीकत बन जाना चाहता हूं जो तुम्हारी जिंदगी का एक अभिन्न हिस्सा हो।। ©ACP

भूटान यात्रा (भाग-०७)

जब हम विकल्प ढूंढ़ते है भूटान जाने के लिए परमिट बनाते वक्त होटल बुकिंग के डिटेल्स भी शो करने होते है।पर जो रेट हम होटल के अलग-अलग साइट पे देख रहे थे वे हमारे बजट में फिट नहीं बैठ रहा था। पर जाना तो था।ऐसे में विकल्प तो होते ही है,थोड़े प्रयास से मिल भी जाते है।अपनी यात्रा अनुभव से ही मैंने सीखा है कि किसी शहर का ऑटो वाला वहाँ की पुख्ता जानकारी दे सकता है।हासिमरा से जयगांव के बीच की दूरी को हमने ऑटो से तय किया और इस दौरान मैं ऑटो ड्राइवर के बगल में  बैठ कर बातें करता रहा। जब हम किसी से मदद चाहते है तो पहले हमें अपनी स्थिति स्पष्ट कर देनी होती है।मसलन यात्रा में हमारा बजट क्या है? किन-किन बातों के प्रति हम अनिश्चिन्तता महसूस कर रहे है? तकरीबन 40 मिनट के सफर में ड्राइवर से मैंने अच्छा बॉन्डिंग बना लिया।जयगांव पहुंचते ही उसने हमें एक सस्ते ट्रेवल एजेंट से मिलवाया पर उससे कुछ बातें न बनी।फिर भी ऑटो ड्राइवर हमें पर्याप्त जानकारी दे चुका था।और फिर कुछ लोकल से बात करने के बाद सबकुछ स्पष्ट हो गया था। भूटान में हमें कुछ ऐसे मित्र मिले जिन्होंने होटल बुकिंग पहले से करवा रखी थी और उ...

भूटान यात्रा (भाग-६)

TAKSHANG आते हुए हम काफी थक गए थे।हमारा कार्ड भी भूटान में काम नहीं कर रहा था।लास्ट ट्रांसेक्शन हमने जयगांव में किया था,तब शायद भूटान इतना एक्सपेंसिव होगा हमें अंदाजा नहीं था, सो निकाले गए पैसों में मात्र अब होटल का रेंट देना भर बचा था। हमने तय किया कि इधर से भी हम बिना टैक्सी ही होटल चलेंगे।पर जिस मस्ती में हम TAKSHANG आये थे, उसने हमारा सारा ऊर्जा सोख लिया था।और अब रास्ते में किसी से लिफ्ट लेना ही विकल्प था। फ़ोटो : ACP हमने सोचा कि पहाड़ी से उतरकर लिफ्ट मांगा जाए।उतरना आसान होता है और  जल्दी ही हम नीचे आ गए।थोड़े से मैदानी एरिया में आते ही तेजी से गुजरती एक कार हमसे कुछ दूरी पर जाकर रुकी।हम दौड़ कर उसके पास गए।फिर क्या! उसने जिस अंदाज में हमें लिफ्ट दिया, दिलचस्प था।हरियाणा में यात्रा करते हुए भी लिफ्ट मांगने-मिलने के कई किस्सों से मैं गुजरा हूँ और वे सभी दिलचस्प रहे।खैर, वे युवा दोस्त भूटान टूरिज्म में कार्यरत है।उनसे बातचीत से पता चला कि उन्होंने भी भारत के कई हिस्सों का भ्रमण किया है।और यहां भूटान के विकास में इंडियन गवर्मेन्ट का अहम योगदान है। अंत में हमने ...

भूटान यात्रा (भाग-०६)

जब हमें एक भारतीय ने लताड़ा तकरीबन छह घंटे के सफर के बाद हम रात के साढ़े नौ बजे थीम्फू में उतरे थे।उतरने के तुरंत बाद ही हमारे सामने कई प्राथमिक चुनौती थी।मसलन होटल ढूंढ़ना, ठंडी के कपड़े खरीदना,और फिर खाना खाना। ऐसा लग रहा था सब कहीं एक जगह ही हो जाये तो कितना अच्छा हो।पर ऐसा नहीं ही हुआ।हमें बस स्टैंड से होटल ढूंढ़ने तक में ही लगभग आधे घंटे से ज्यादा लग गए।होट ल ढूंढ़ने के दौरान हमने एक भारतीय का सहारा लेना चाहा पर उन्होंने हमें यह कह कर लताड़ दिया कि हमने Make My Trip का इस्तेमाल क्यों नहीं किया? उन्होंने हमें साफ कह दिया कि इस समय होटल नहीं मिलेगा। हमारे पास बहस करने का टाइम नहीं था। दरअसल भूटान में एक नियम है कि रात के दस बजे के बाद दुकान वैगरह बंद कर दिए जाते है।बाहर घूमना भी सेफ नहीं होता क्योंकि उस वक्त ड्रग एडिक्टेड युवा सड़को पर अपनी गुंडागर्दी दिखा सकते है। photo : ACP फाइनली हमें एक होटल मिल गया और हमनें वह भी न मिले इस ख्याल से अन्य एक दो होटल जाने के बाद ही उसे बुक कर लिया।इतनी ठंड थी कि पानी छूने का इरादा नहीं हो रहा था।फिर भी फ्रेश होकर हम बाहर आ गए।थीम्फू की संरचना किसी...

भूटान यात्रा (भाग-५)

भूटान सड़क मार्ग से जाते वक्त दो बार हाईवे पे कड़ी सुरक्षा-जांच से गुजरना होता है।मसलन एक ही बस में यात्रा कर रहे मेरे एक सहयात्री के पास एक खिलौना था जिसे पुलिस समझ नहीं पा रही थी कि आखिर यह है क्या, इस कारण हमारी गाड़ी को काफी देर तक रोका गया। इसके बाद हमें कहीं भी सुरक्षा-जाँच का सामना नहीं करना पड़ा।यहाँ तक कि थीम्फू में पार्लियामेंट वाले एरिया में भी। फ़ोटो : ACP #ACP_in_Bhutan 

भूटान यात्रा (भाग-४)

कल शाम को मुझे पुलिस ने रोक लिया।उन्होंने थोड़ा बहुत डाँटा भी।मैं जहाँ रोड क्रॉस कर रहा था उससे लगभग 500 मिटर की दूरी पर जेब्रा क्रोसिंग थी और मुझे उधर से ही जाना चाहिए था। Photo : ACP यहाँ ट्रैफिक नियम काफी सख्त है।पकड़े जाने पर दंड का प्रावधान है।जगह-जगह पर रोड पार करने के लिए जेब्रा-क्रोसिंग बनी है और जैसे ही कोई जेब्रा-क्रोसिंग किनारे खड़ा होता है,गाड़ी वाला स्वंय गाड़ी रोक देता है।और ऐसा करते हुए वह इरिटेट भी नहीं होता।कल जिस टैक्सी में बैठा था, देखा कैसे वह स्वाभाविकतः जेब्रा क्रोसिंग पर गाड़ी रोक देता है।सभी नियम बेहद सामान्य तरीके से फॉलो किये जाते है।कहीं कोई नियम बोर्ड नहीं लगा है।नियम भी इतने सहज है कि पालन कर लिए जाते है। #ACP_in_Bhutan

भूटान यात्रा (भाग-३)

कितनी ठंडी है यहाँ ! फुन्सलिंग से थीम्फू 172 किमी दूर है।और इस दौरान गाड़ी लगभग ऊपर की ओर चढ़ती है।लास्ट टाइम जब कोलकाता में थिम्पू का टेम्परेचर चेक किया था तो सामान्य ही लगा सो कोई ठंड का कपड़ा नहीं लिया।पर अब ठंड से बदन कपकपा रहा है।सो जल्दी ही मुझे यहां एक जैकेट खरीदना होगा। थिम्पू तक आने के लिए जो सड़क मार्ग है वो बेहद खतरनाक व दिलचस्प है।आप सोचते रह जाएंगे कि आखिर हिमालय को काट-काट कर ये सड़क बने कैसे होंगे।जगह-जगह रुक कर यूँ ही वाटर फॉल देखते रहने  का मन करता है तो कहीं कहीं लगता है हिमालय की गोद में बैठा रह जाऊँ।बादल को पहली बार इतना नजदीक देख रहा हूँ,जैसे आज उनसे मिलना हो रहा हो। फ़ोटो : ACP  मौसम इतना शानदार है कि हवाओं से ही एक खास प्रकार की ऊर्जा महसूस होती है।भूटान की खूबसूरती ही प्रकृति से है इसलिए उसने प्रकृति की छेड़छाड़ को लेकर कड़े कानून बना रखे है।यह एक आवश्यक कदम है जो भूटान की लंबी उम्र में सहायक होगी। फिलहाल मेरा तो मन है कि यहीं कुछ ज्यादा दिनों तक रुक जाऊँ पर हमें पाँच दिनों का ही परमिट मिल पाया है।और फिर परमिट लेने का प्रक्रिया बड़ा ही इरिटेटिंग...

भूटान यात्रा (भाग-२)

SRFTI का विकास और हमारा जुगारूपन किसी शहर को जानने का सबसे बेहतर तरीका हो सकता है उसको जागते हुए देखना।और वैसे भी कोलकाता में गर्मी बहुत ज्यादा है।पसीने बहाने वाली गर्मी।इसलिए सुबह निकल जाना ही ज्यादा उपयुक्त था।यहाँ आने के बाद SRFTI घूमना पहली प्राथमिकता में थी।इसलिए आज सुबह ही थोड़े लेट से हम पीली टैक्सी से SRFTI के गेट पर पहुंच गए। पर गेट से अंदर जा पाना एक अलग चुनौती थी।गार्ड ने हमसे कहा कि किसी स्टूडेंट को बुलाओ,उसके  कहने के बाद ही अंदर प्रवेश दिया जा सकता है।दूसरा कोई विकल्प नहीं है।हम किसी भी ऐसे स्टूडेंट्स को नहीं जानते थे जो हमें प्रवेश दिलाने में मदद कर सकें।फिर भी हमने कहा कि हम विकास को जानते है पर अभी उससे कांटेक्ट नहीं पा रहा।एक्चुअली हमलोग फेसबुक फ्रेंड है। गार्ड के चेहरे पर रौनक आयी।और वह चहकते हुए बोला विकास तो शूटिंग कर रहा है।इसलिए फ़ोन नहीं उठा रहा होगा।तभी अंदर से दो छात्र वहां आकर रुके।गार्ड ने उनसे कहा कि अरे जरा विकास को कॉल करना और इनसे बात करवा देना।हमें लगा,यार अब तो फंस गए।विकास का नाम निशांत के मुंह से इतेफ़ाकन ही निकल गया था।पर संयोग से विकास ...

भूटान की ओर (भाग-०१)

निशांत ( Nishant ) सो रहा है।बाहर से आती इतनी अच्छी हवा में नींद आ जाना स्वाभाविक ही है।अक्सर लोग यात्रा में शायद इसी वजह से सो जाते हो।पर मैं नहीं सो पाता।विंडो सीट से पीछे छूटती दृश्य को देखना और नए जगह पहुँचने के बाद कि जिज्ञासा से मैं भरा रहता हूँ।अपनी अधिकतम रफ्तार में भागती यह ट्रेन बहुत सी छोटी-छोटी स्टेशनों पर हॉर्न बजाती हुई तेजी से निकल जाती है,उन स्टेशनों पे भी तो लोग किसी ट्रेन का इंतजार करते होंगे। Photo : ACP सम्भवतः कल शाम तक यह ट्रेन हमें कोलकाता पहुँचा देगी।अभी तक कोलकाता  में हमें दो होस्ट मिले थे जिनमें से एक ने अभी दो दिन पहले ही हमें होस्टिंग करने में अपनी असमर्थता जताया। हमारे दूसरे होस्ट विनीत है।वे पेशे से एक इंजीनियर है।व एक वक्त पे एक ही व्यक्ति को होस्ट करते है।इसलिए हमें कोई और विकल्प भी ढूंढ़ना होगा।वैसे हमने कुछ अन्य लोगों को भी होस्ट करने का रिक्वेस्ट भेजा है।देखते है कल शाम तक कोई और होस्ट भी मिल ही जायेगा। #ACP_in_Bhutan

एक उदास कविता

एक उदास कविता ----------------------- तो , ऐसा कभी नहीं होता था कि , तुम नहीं होती थी तुम्हारी उपस्थिति मेरी आदत थी और तुम्हारा सौंदर्य   मेरा अभिमान पर , अब तुम नहीं हो और यह मेरा सत्य है तुम्हारा सत्य तो कहीं और होना है इसलिए तुम चली गई हो सब कहते है   तुम जहाँ गयी हो लोग वहाँ से वापस नहीं आते पर यह कैसा जाना हुआ जब हम लौट कर ही ना आ पाएं इसलिए मैं इंतज़ार करूँगा कभी इस रास्ते पर तो कभी उस रास्ते पर तुम किस रास्ते गयी थी मुझे ये भी तो नहीं पता न ! ©ACP

जब कुछ नहीं दिखता

                   जब कुछ नहीं दिखता वह हाथ देता हूँ पर कोई गाड़ी नहीं रोकता देर रात हो गयी है न ! इसलिए आदमी का आदमी से भय बढ़ गया है सड़के सुनसान है एकाध गाड़ी तेज़ी से गुज़र जाती है और एकाध टेडी-मेढ़ी भी रात में किसी को किसी का परवाह नहीं होता और रात बनती भी तो ऐसे ही है बहुत देर बाद एक बस उसके सामने आकर रुकी है ड्राइवर ने शायद उसे देख लिया हो रात में भी कुछ लोग दूसरों को देख लेते है वह कहाँ जा रहा है इससे कोई फर्क नहीं पड़ता बस जहाँ भी उसे पहुँचा देगी उससे आगे की वह सोचेगा पर रात में सोचने भर से भी कुछ नहीं होता तब हमारी सोच पे भी रात का साया होता है इसलिए ही शायद रात ज्यादा भयानक होती है रात ऐसी ही हुआ करती है यह अपने होने के क्रम में और भयानक होती जाती है कुछ देर के बाद ड्राइवर बस को किसी किनारे लगा देगा और उससे कहेगा कि तू अब चला जा या ऐसा भी हो सकता है कि ड्राइवर ज्यादा दयालु हो   और वह सोचे कि यह रात में कहां जायेगा ? क्योंकि रा...