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【ये सब पागलपन की बातें है】

मसलन खिड़की किनारे बैठा मैं, जो कि यात्रा में मुझे अधिक पसंद है, यही सोच रहा होता हूँ कि पहाड़ो के किनारे से होकर बस गुजर कैसे जाती है जबकि बगल में ही तो गहरी खाई है।या फिर जब बस गांधी सेतू से गुजरती है तब मैं सोचता हूँ कि पूल टूट कर गिर भी तो सकती है या बस का संतुलन भी तो बिगड़ सकता है।और अगर बस गंगा में गिर गयी तब क्या होगा, मुझे तो तैरना भी नहीं आता। ड्राइवर भी आदमी होता है, ऐसे खतरनाक पलों में वह क्या सोचता होगा? और मैं तो सोचता रहता हूँ कि जब सारी दुनिया सुबह उठने के लिए संघर्ष कर रही होती है तब भी मेरे गांव से होकर गुजरने वाली बस का ड्राइवर जाड़े में भी इतनी सुबह बस कैसे ले आता है? या रात-रात भर ट्रेन का ड्राइवर कैसे जगा रह जाता है? दिन में सोने से रात भर की नींद पूरी हो जाती होगी क्या? जब दिन में वह सोता होगा तब क्या उसे सपने आते होंगे? यात्रा में कुछ बातें अनवरत मेरे दिमाग मे चलती रहती है।चाहे मैं ट्रेन में बैठा होऊँ या किसी बस में।ट्रेन और बस की रफ्तार मेरे मन की गति के समानांतर होती है, ट्रेन के दो पटरियों की तरह।जिसके एक हिस्से पे ट्रेन और बस चल रहा होता है तो दूसरे ह...

【नायिका का जलेबी प्रेम】

पटेल चेस्ट से आगे, मॉरिस नगर पुलिस स्टेशन के ठीक सामने अमित जी अपना ठेला लगाया करते।शाम होते ही भीड़ उनके ठेले के आसपास जमने लगती।वजह उनके हाथों की बनी गरमा-गरम जलेबी होती।खौलते तेल में अमित जी के हाथ को इधर से उधर घूमता हुआ नायक गौर से देखता और देखते ही देखते परत दर परत चढ़ती जलेबी तैयार हो जाती। नायक को अमित जी के हाथों की बनी जलेबी और अधिक मीठी इसलिए भी लगती क्योंकि वह नायिका के ही गांव के थे।और अक्सर कैम्पस के दिनों में जब कॉलेज खुला होता, नायक नायिका के साथ यहाँ जलेबी खाने आया करता। बातों ही बातों में नायक न जाने किन किन नुक्कड़ से होते हुए नायिका के घर से अमित जी के घर तक का रास्ता ढूंढ़ लेता और फिर गूगल मैप में अमित जी को दिखाता, अमित जी अपनी बड़ी-बड़ी आंखों से देखते हुए कहते "हां, बिल्कुल सही दिखाता है बाबू।" ऐसे ही अमित जी से कई बातचीत में नायक न जाने कितनी गलियों और चौराहों को अमित जी की बातों में पहचानने लगा था।और दोनों में ऐसी बनती जैसे वर्षों का याराना हो।जब कभी भी नायिका नायक के साथ जलेबी खाने वहाँ आती, फिर तो अमित जी कुछ ज्यादा ही जान फूंक देते जलेबी बनाने ...

【हाथी भी चलते हुए रेड लाइट पे रुक जाता होगा】

"आदमी का दिमाग उसके शरीर से भी बड़ा होता होगा।बहुत बड़ा।इसलिए ही उसकी सहज जिज्ञासा हमेशा कायम रहती है।वह सोचता जाता है, निरंतर प्रश्न करता जाता है।" लक्ष्मी नगर से 336 नंबर की बस में लोधी गार्डेन के लिए बैठी नायिका ऐसा ही सोच रही है जब नायक उससे सहज ही पूछ बैठता है "क्या हाथी भी यूँ सड़को पे चलता हुआ, रेड लाइट पे रुक जाता होगा।" नायिका एक पल को नायक के इस प्रश्न से अकचकाती है पर जब नायक उसे बस की खिड़की से बाहर देखने को कहता है तो वह नायक के जिज्ञासा का कारण समझ पाती है।बाहर वह देखती है एक हाथी को।और उस बड़े से हाथी के ऊपर बैठे एक मतवाले अदना से आदमी को। Photo - Getty Image ITO की ओर दोनों मस्ती में जा रहे है।उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि जिस सड़क पे वे इतने मतवाले होकर चले जा रहे है उसपे अन्य बहुत सी तेज गाड़ी उसी ओर भाग रही है जिधर की हाथी और ऐसे में उनके धिमे चाल को कोई ठोकर भी मार सकता है।और अगर हाथी बीच सड़क पे गिर जाए तो क्या होगा? या वह आदमी जो हाथी के ऊपर मस्ती में बैठा है? क्या तब भी लोग खूब हॉर्न बजाएंगे।नायिका यह भी सोच रही कि हाथी ने क...
बनना तो चाहता था मैं तुम्हारी ठोडी का तिल। पर बन बैठा मैं तुम्हारा प्रेमी। अलग तो होना ही था। # ACP

उम्र भर की नींद.

मैं सो जाना चाहता हूं अपनी बची हुई उम्र भर के लिए ताउम्र के लिए। ऐसी नींद में जो कभी न खुले फिर सूरज के किसी किरण को देखने के लिए। मुझे वो नींद सौप दो माँ। जो मुक्ति हो इस अंधेरे के बाद कि उजाले से मुझे वो नींद दो मां। अपनी आँचल में सूला लो मुझे फिर कभी न जगने के लिए मुझे नींद दो माँ मुझे नींद दो ताउम्र के लिए।

खामोश आहट

न दिन होता है अब और न ही रात होती है बस ख्यालों में उनसे मुलाकात होती है। मन के दरवाजे पे बैठा दरबान बार-बार किसी के आहट का संकेत देता है देखती है नजरे उधर पर उनके अनुपस्थिति भर से नजरें खामोश होती है। दूसरे कमरे में बैठा मेरा छोटा भाई, थोड़ी-थोड़ी देर पे किसी सुडोको को सुलझा लेने पर खुशी से ऐसे उछल पड़ता है जैसे कभी उनके आहट पर मैं उछल जाया करता था। कौन जाकर उनसे कहे भला कि विरह का आलम जिस्म के जर्रे-जर्रे को ऐसे तोड़ रहा है कि मिलने की इबादत में ही यह जिंदगी तमाम होती है।

"पल पल दिल के पास तुम रहती हो"

बात तब की है जब 'गजनी' फ़िल्म आयी थी।फ़िल्म से नायक इतना प्रभावित हुआ था कि वह तब से डायरी लिखने लगा था।और अक्सर डायरी वह रात को सोने से पहले लिखा करता।दिन भर स्कूल की क्लासेज-ट्यूशन और फिर शाम को क्रिकेट से थकता-उतरता उसका जिस्म देर रात को जब डायरी लिखने के लिए बैठता तो अंदर ही अंदर उसे बड़ी मोटिवेसन मिलती, यूँ ही लिखते रहने को। इसकी एक खास वजह थी। तब स्कूल तो को-ऐड था पर क्लास में लड़के और लड़कियों को अलग बैठने के साथ ही मिलने-जुलने की साफ मनाही थी।उनके गतिविधियों पे स्पष्ट नज़र रखा जाता था।ऐसे में प्रेम होने का ख़्याल जितनी तेजी से चढ़ता उतने ही तेजी से उस माहौल में उतर भी जाता।तो सब के साथ ही नायक के लिए भी प्रेम का घटना एक फिल्मी सम्भवना थी।जब अचानक से आसमान में बादल छा जाएंगे, तेजी से हवा बहने लगेगी, फूल-पत्तियां सब में एक खास रौनक आ जायेगी जब नायिका सामने आयेगी। Photo - ACP तो ऐसी ही कल्पना से ओतप्रोत नायक अपनी डायरी में प्रेम से उलझता-सुलझता रहता।खुद ही प्रेम के किसी काल्पनिक भंवर में फंसता और सोचते-सोचते सोता हुआ, क्लास में त्रिकोनमेट्री का कोई सवाल सुलझाता हुआ...

"मैं जानती थी, तुम्हें तैरना नहीं आता"

एक खास ऊँचाई से पत्तियां शुरू होती हुई नारियल के इन पौधों की खूबसूरती देखते बनती है।और पत्तियों से छनकर आ रही चाँद की रोशनी में पूरा कालडी अद्भुत रौनक सी चमक रही है।चाँद अब भी फलक पे है जबकि सुबह की आहट दिखाई देने लगी है। नायक और नायिका दोनों एक-दूसरे की हाथों में उँगली फंसाये कालडी के बस्तियों से गुजरते हुए सुबह की आहट पर लोगों के दिनचर्या की सुगबुगाहट देख रहे है।उनका मन है कि अभी थोड़ी देर और यूँ ही बस्तियों में भटकते रहे।पर नायिका जल्दी से पेरियार के किनारे पहुंच दूर पहाड़ी की ओट से निकलता सूरज देखने को ज्यादा इक्छुक है। हल्की ठंड भी है।कालडी के पश्चिमी भाग से चलते हुए अब वे जंगल की ओर आ गए है।जो सीधा उन्हें पेरियार किनारे तक ले जाएंगी।पर पत्तियों पर टिके ओस की बूंद उनकी आहट से जैसे ही उनके ऊपर टपकती है वे और सिहर उठते है।वैसे भी जंगल के बीच वे ऐसे चल रहे है जैसे दो जिस्म एक में सिमट गए हो फिर भी ओस की बूंद से खुद को बचा पाना उनके लिए असंभव सा है। घने जंगल को वे नापते जा रहे है।पर जंगल है कि खत्म ही नहीं हो रही।नायिका चिंतित है कि कहीं इस बीच सूरज न निकल आये।वह नायक से कहती है...

प्रीतिकर

साथ बिते वक्त की तुलना में हमारे बिछोह का वक्त ज्यादा है हमारे हिस्से, इसलिए एक वक्त में मिलने से बिछुड़ने तक बिता वक्त एक स्थिर घटना है हमारे लिए, जिसमें समय से ज्यादा हम खुद घटते है। यूँ फिर मिलन के बाद की जुदाई में स्थिरता आ जाती है हमारे बीच, अगली मिलन तक के लिए। जब यादें हमारे अंदर घटती रहती है हमारा चित्त, एक-दूसरे से बहुत दूर होते हुए भी यादों में करीब होता है। इतना करीब कि, इन नजदीकियों में मिलन के बाद कि जुदाई ही, शाश्वत लगती है बाकी सभी सन्नाटे ही लगते है।।

【_जिन नयनन में पिया बसे_】

"हरेक दफे जब आती हो तुम, लगता है तुम्हारा सौंदर्य पहले से और निखर गया है।कितना भी आंखों में बसा लूँ तुम्हें, अगली बार तुम उतनी ही अलग और नयी दिखती हो।" "अच्छा।तो क्या इसलिए ही जब भी आती हूँ, यूँ ही निहारते रहते हो।कुछ बोलते नहीं।" "क्या बोलूँगा मैं।इतना देख लेने भर से जी कहाँ भरता है मेरा।" "तो आंखों में भर लिया करो मुझे।" "तुम तो आंखों में भी नहीं समाती।" "और तुम कौन से समा जाते हो।" Photo - Vergel tolentino नायिका नायक के हाथों पे कोई अज्ञात सी आकृति बना रही है।जो हर चौथे दिन मिट जाती है ताकि फिर से नायिका उन आकृतियों को नए रूप में गढ़ सके।सहज ही नायिका आगे कहती है- "और अगर कभी कहीं मैं अचानक से गायब हो गयी तो?" "तो? क्या!" "तो क्या! तुम मेरी याद में कविता नहीं लिखोगे?" "नहीं।मैं कुछ नहीं लिखूंगा।सब छोड़ दूंगा।" "क्यों! क्यों कुछ नहीं लिखोगे?" "बस नहीं लिखूँगा।बोल तो दिया।" "तो क्या करोगे मेरी याद में?" "कुछ नहीं।...

"तुम कभी मेरे पास बीमार क्यों नहीं पड़ जाती"

"क्या दुनिया की सारी नायिकाओं का भाई एक जैसा होता है।अपनी बहन पे नजर रखने वाला।उसके एक-एक पल का हिसाब रखने वाला।कहाँ जा रही है, किससे मिल रही है? सब पर तिरछी नजर रखने वाला।और वक्त बे वक्त अपनी बहन को डांट देने वाला"। नायक अपनी नायिका के भाई के बारे में सोच रहा है।जो उसकी कहानी में किसी विलेन की तरह है।पर जिसमें नायक अब भी बदलाव की संभावना देख रहा है।वह उन तमाम संभावनाओं पे विचार कर रहा है जिसस े नायिका के भाई को नायिका के स्वतंत्रता की कीमत समझाया जा सके।उसे बता सके कि देखो नायिका तुम्हारी बंधन से बाहर कितनी उन्मुक्त है, कितनी खुश है। इधर नायिका बीमार है और उधर नायक व्हाट्सएप और फ़ोन कर लेने भर से संतुष्ट नहीं हो रहा।नायक को लगता है हालचाल भी भला क्या फ़ोन पे जाना जा सकता है, ऐसी स्थिति में तो पास से ही कुछ जाना जा सकता है।इसलिए ही जब नायिका फ़ोन पर कहती भी है 'मैं अब ठीक हूँ' तो नायक पलट कर कहता है कि 'तुम्हारी आवाज ही बता रही है कि तुम स्वस्थ नहीं हो'। नायक बात करते हुए नायिका को स्वास्थ्य संबंधी एक-दो टिप्स देता है।वह घंटो विकिपीडिया पे माथा खपाता है ...
दार जी को कहानी सुनाने का बड़ा शौक था।इसलिए वे बोलते जाते।इस बात से अनभिज्ञ कि कोई उन्हें सुन भी रहा है या नहीं।जब घंटों वे खेत में काम किया करते और मैं उनके लिए पनपियाई लेकर जाता तब भी वे बोलते हुए मिलते।किसी को कुछ सुना रहे होते।मेरे लिए वहां कोई नहीं होता पर दार जी लगातार किसी से बात कर रहे होते।मसलन तामे जा रहे खेत की मिट्टी से या पास की झाड़ियों से।मैं भी वहाँ बैठा, उन्हें सुनता रहता।उनके खा लेने पर भी।पर दार जी को कभी फर्क ही नहीं पड़ा किसी के होने और न होने से।वे बस किसी काल की कोई कथा बोलते जाते।कोई आधा वाक्य, कोई आधी कविता या कोई छूटी हुई कहानी। #ACP #ImagethroughmyEyes

चोर के नाम पत्र.

प्रिय चोर, मुझे आपके समुदाय से हमदर्दी रही है। ऐसे वक्त में जब सरकार तक लूटने पर लगी हो, मेट्रो के फेयर अप्रत्याशित रूप से बढ़ रहे हों, डीटीसी की हालत खस्ता हो, बेरोज़गारी हो और एक छुपी हुई अव्यवस्था भी चारों ओर कायम हो तो माना जा सकता है कि आपने कोई बड़ा जुर्म नहीं किया है। वैसे आपके प्रोफेशन का जो ग्लैमर है, मैं उससे भी प्रभावित होता हूं। आपका समुदाय तो मुख्यमंत्री तक की गाड़ी यूं ही गायब कर देता है, तो हम किस खेत की मूली हैं, हम तो और आसानी से कट सकते है। Google Photo मुझे याद है जब संत राम-रहीम पकड़े गए थे तो मैंने अपने आसपास के लोगों और सफर करते हुए बहुत से लोगों को उनके वैभव के बारे में बात करते हुए, यह कहते सुना था कि बाबागिरी भी अच्छी प्रोफेशन हो सकती है, ट्राइ करना चाहिए। जहां पूंजी ही ईमान को एक हद तक तय कर रही हो, वहां लोगों का ऐसा सोचना गलत हो सकता है क्या? पता नहीं। हां, पर आपके प्रोफेसन में अब और भी प्रगति होगी ऐसा मुझे लगता है। पिछली बार मेट्रो के फेयर बढ़ने से रोज़ाना लगभग दो लाख यात्रियों ने मेट्रो को बाय-बाय कहा था और इस बार की बढ़ोतरी तो और भी कमर तोड़नी वाली है। ...

"जिसके लिए जिया जा सके"

कोई अपने दरवाजे से बाहर निकलता है फिर बाहर की दुनिया शुरू होती है।अनन्त दुनिया।और कोई बाहर निकल कर बहुत दूर जा सकता है।बहुत दूर। पर क्या हर बार बाहर निकलनेे के बाद लौट आना ही किसी की नियति होती है? शाम को घर लौटते हुए नायिका अक्सर यही सोचती है।इतने बड़े शहर में कहीं उसका घर है।घर में एक छोटा सा उसका कमरा है।और कमरे में बहुत सी ऐसी चीज़ें है जो उसने एक-एक कर जुटाए है।एक घड़ी है जो निरंतर टिक-टिक करता हुआ कैलेंडर के दिन को महीनों और फिर सालों में बदलता जाता है।पर बाहर सबकुछ वैसा ही है।कुछ किताबों के दाहिने तरफ टेबल के किनारें एक लैम्प है जो नायिका के किसी सपने का एक कैरेक्टर भर लगता है।एक पंखा है जो छत से लटका नायिका की ओर झाँकता हुआ रोज नायिका से बातें करता रहता है।और कमरे के दूसरी गेट से सटा, जो बालकनी की ओर खुलती है, कुछ गमले रखे है जिसमें लगी फूल की तनाएँ बालकनी की ओर फैली है। कमरे में एक तरफ बेड के ठीक सामने कुछ फ़ोटो लगे है।पहली फ़ोटो अंजुना बिच की है, जिसके किनारे कोई लड़की ठेहुने पर गाल टिकाए बैठी अनंत की ओर देख रही है, अनंत जहाँ समुद्र का किनारा आकाश से मिलता होगा।।दूसरी फ़ोटो,...

हम दोनों का यूँ मिलना

आसमान बहुत बड़ा होता है पर हम उतना ही देख पाते है जितना कि हमारी दो नजरे देखने का प्रयास करती है।नायक के सामने सारा आकाश है पर वह देख रहा है, एक चाँद को और उसके आसपास एक भी तारे को नहीं। कुल मिलाकर आसमान के एक छोटे से हिस्से को जिसमें चाँद के करीब कोई एक भी तारा नहीं है।चाँद पूरा है आज, एकदम से साफ आसमान में।आसमान उतना ही साफ और सुंदर दिख रहा है जैसे किसी न अभी अभी धोकर चमकाया हो जैसे। नायक सोच रहा है कि यही चाँद नायिका के छत से भी दिखता होगा? और क्या नायिका भी इतना ही आसमान देखती होगी? एक चाँद को और कुछ आसमान को। बीते कई दिनों से नायक की बात नायिका से नहीं हुई है।कोई एक भी अपनी-अपनी व्यस्तता से समय निकाल कर दूसरे को कॉल नहीं कर पाए है।इधर नायक को रोज देर रात को ही ध्यान आता है कि वह आज भी नायिका से बात नहीं कर पाया है।और फिर उसका नायिका से बातचीत करने की तलब अचानक से बढ़ जाती है। वह चाँद के बड़े से आकर को देखता है जिसपे नायिका सर रखकर सोयी हुई है।गहरी नींद में।उसके बाल कुछ इस तरह बिखरे है कि उसका चेहरा पूरी तरह नहीं दिख रहा।हाँ, उसकी सांसों की गति से नाक के पास बिखरी बालों म...

तेरा शहर जो पीछे छूट रहा

शहर इश्क़ नहीं सीखा पाता, इश्क़ शहर में रहना सीखाता है। कई वर्ष हो गए नायक को इस शहर में रहते हुए।पर अक्सरहाँ कुछेक महीनों पर चिराग दिल्ली से लेकर ITO की ट्रैफिक हो या रोज सुबह उठकर मेट्रो की सफर से कॉलेज पहुँचना हो, सब उसे उबाउं लगने लगती।फिर वह बैग लेकर निकल जाता कहीं।कहीं, किसी रास्ते पर जो इस शहर से दूर ले जाती हो। पर आजकल बहुत दूर निकल कर भी वह इसी शहर में छूट सा जाता है।उसे महसूस होता है कि उसका कुछ हिस्सा इसी शहर में छूट गया है।वह हिस्सा जो बाहर का है ही नहीं, उसे वह कहीं और कैसे ढूंढेगा।जैसे अब किसी फूल की खुश्बू फैली हो इस शहर में और जैसे-जैसे वह दूर जाता हो उसे उस गमक का सुखद एहसास कमने लगता हो।जैसे वह जितनी भी सांसे लेता है, वे सारे ऑक्सीजन अब इसी शहर में बच गए हो।और जैसे इस शहर में ही कोई सूरज निकलता हो और फिर कोई सूरजमुखी का फूल खिलता हो। इस बार नायक नायिका से कहता है "आज आ जाओ न, मिलने के लिए।कल चला जाऊँगा"। उधर नायिका घर के साफ-सफाई से कुछेक पल निकाल व्हाट्सएप खोल लेती है।बड़े से लाठी में बंधे झाड़ू को एक तरफ रख वह लिखती है "घर में बहुत काम है।कुछेक कम...

"मोनालिसा जैसी तुम्हारी मुस्कान"

जब भी वह यूँ ही बैठी होती, अलग-अलग भाव में खुद का सेल्फ़ी लेती रहना उसका पसन्दीदा काम होता।अपनी फोटो खुद से ही खींचते रहना नायिका को बेहद पसन्द है। कभी-कभार वह अपनी फ़ोटो नायक को व्हाट्सएप कर देती है।और नायक अक्सर ही उसकी फ़ोटो पे कोई छोटी सी कविता दुहरा देता।एक मध्य रात्रि को नायिका ने अपनी तस्वीर नायक को भेजा।दोनों अपनी-अपनी छत पे चाँद को बादलों से आँख मिचौली करते हुए देख रहे थे।पहले तो नायिका इंतजार करती रही कि नायक फिर कोई सुंदर सा पंक्ति सुनायेगा।पर नायक को खामोश देख, उसने पूछ लिया "क्या हुआ?" नायक ने लिखा "तुम्हारी फ़ोटो निहार रहा हूँ"।नायिका का चेहरा खिला।उसने देखा चाँद के आसपास अभी बिल्कुल ही बादलों का ओट नहीं है।वह ऐसे चमक रहा है, जैसे अभी-अभी उसे अपनी चकोर की खबर हुई हो। नायिका ने लिखा "ऐसा भी क्या! रोज तो देखते हो"। उधर नायक ने महसूस किया, चाँद की दूधिया रोशनी में नायिका का दिया हुआ पश्मीना शॉल बेहद ही सुंदर लग रहा है। नायिका की आँखों में उसके सपनों का एक संसार बसता है।जिसे वह अलग-अलग किस्तों में पूरा करती है।उसका बड़ा सपना था कि डल झील ज...

"बस पाँच मिनट और रुक जाओ न !"

समय से भी किसी को शिकायत हो सकती है क्या।भला इतना शांत, चुपचाप किसी भी हालात में अपने काम मे लगे रहने वाला, समय।पर अपने नायक को इनदिनों थोड़ी बहुत शिकायत है समय से। उसका मानना है कि जब भी नायिका उससे मिलने आती है, समय कुछ तेज चलने लगता है।वह नायक की परवाह ही नहीं करता।और न ही उसके प्रेम की परवाह करता है।नायक के अनुसार ऐसे किसी भी चीज़, व्यक्ति या वस्तु को समाज में रहने का कतई अधिकार नहीं है। अब नायक समय पे थोड़ा सा झल्लाता तो है पर समय का रुख वैसे ही बेपरवाह।तो नायक अंततः नायिका से ही कहता है "बस पांच मिनट और रुक जाओ न! फिर चली जाना" उस दिन नायिका उठ खड़ी हुई और जिद्द करने लगी कि आज न रुकूँगी।भला नायक का पांच मिनट कभी खत्म हुआ है।घण्टों की मुलाकात के बाद भी अंत मे जब नायिका जाने लगे तो पाँच मिनट चाहिए ही नायक को। तो नायिका जानती है इस बात को।शाम को मम्मी नवरात्रि की पूजा करेगी न, इसलिए उसका होना वहाँ जरूरी है।अब इस बात को कैसे समझाए वह नायक को।तो वह कहती है "जो बात है ऐसे ही बताओ न"।नायक कहता है "नहीं,पास आकर बैठो फिर बताऊंगा"। Photo - ACP ...

रेखाचित्र

बहुत ही कम दिनों तक साथ रही वह साथ के दिनों में जब भी वह मिलती घंटो कभी बातचीत में तो कभी खामोशी में कट जाती अक्सरहाँ मिलकर पता नहीं कौन सी आकृति कलम से वह मेरे शरीर के अलग-अलग ...
"Love is so short, forgetting is so long"                         ~Pablo